परिजनों ने तीनों मृतकों की पहचान राशिद, संजर और ग्यास के रूप में बताई। रविवार को इनके दोस्तों ने शवों की शिनाख्त की थी। उस दौरान पुलिस ने कहा था कि पोस्टमार्टम तभी होगा जब किसी के आधार कार्ड में मृतक का नाम होगा, फिर चाहे वह बेटा हो या पत्नी। पुलिस की इस शर्त पर दोस्तों ने बिहार के सहरसा जिला निवासी मृतकों के परिजनों को फोन पर जानकारी दी।
अपने बेटों के मातम में डूबे परिजन आनन-फानन में अपने घर से दिल्ली के लिए निकल पड़े। 24 घंटे से भी ज्यादा का सफर तय करने के बाद जब मंगलवार सुबह लोकनायक अस्पताल पहुंचे तो पुलिस ने मृतक का आधार कार्ड मांग लिया। परिजनों का कहना है कि आधार कार्ड मरने वालों के पास ही था। अब वो इमारत में बाकी सामान के साथ जल गया या नहीं। इसके बारे में कैसे बता सकते हैं।
परिजनों के अनुसार जब उन्होंने पुलिस को ये जानकारी दी तो पुलिस ने मृतक के आधार कार्ड पर मौजूद नंबर पूछ लिया। परिजनों ने फिर कहा, साहब हमें हमारे कार्ड का नंबर नहीं पता तो उनका नंबर कैसे पता होगा? गांव में आधार कार्ड हो भी तो उसकी तलाश करने वाला कोई नहीं है, सब लोग तो यहां आ गए।
राशिद के भाई महबूब ने बताया कि सुबह से बार-बार बोलने के बाद भी पुलिस मानने को तैयार नहीं है। मंगलवार दोपहर 2 बजे तक पुलिस ने इनके पोस्टमार्टम कराने की मंजूरी नहीं दी। वहीं संजर के दोस्त मोहम्मद जमाल ने बताया कि उनके फोन में पहले से ही दोस्त का आधार कार्ड था, इसलिए उन्हें जब याद आया तो मोबाइल के पुराने डाटा से निकाल कर दे दिया, लेकिन बाकी के आधार कार्ड नहीं हैं। पुलिस को लग रहा है कि हमारे पास बाकी दोनों के पहचान पत्र भी हैं, मगर जानबूझकर दे नहीं रहे हैं।