देश में अमीर और गरीब वर्ग के बच्चों की शिक्षा के बीच एक बड़ी खाई हमेशा से मौजूद रही है। लेकिन कोरोना काल में यह खाई और ज्यादा बढ़ी है। अमीर वर्ग के बच्चे इंटरनेट, लैपटॉप, कंप्यूटर जैसी सुविधाओं से लैस थे, लिहाजा उनकी शिक्षा बहुत कम प्रभावित हुई है। वहीं गरीब वर्ग के बच्चे मोबाइल तक की सुविधा से वंचित रहे हैं, जिसके कारण उनका पूरा साल खराब हो गया है। ऐसे में यह बहुत मुश्किल सवाल है कि अब इन बच्चों से यह पूछा जाए कि परीक्षाएं टालनी चाहिए या नहीं। इसकी बजाय इन बच्चों से यह पूछा जाना चाहिए कि इस दौरान उन्होंने क्या सीखा है। यह कहना है आम आदमी पार्टी नेता आतिशी मार्लेना का। वे हार्वर्ड इंडिया कांफ्रेंस में बोल रही थीं।
आतिशी ने कहा कि कोरोना काल में बच्चों की शिक्षा पर ध्यान देते समय सबसे ज्यादा प्रमुखता इस बात पर दी गई कि बच्चों के अभिभावकों को उनकी शिक्षा के साथ जोड़ा जाए। क्योंकि आधुनिक सुविधाओं के अभाव में यही वर्ग था जो शिक्षा की महत्त्वपूर्ण जानकारी बच्चों तक पहुंचा सकता था। इन्हीं के आधार पर भविष्य की परिभाषा तय की जा सकती है।
उन्होंने कहा कि दिल्ली सरकार के स्कूलों में बेहद निम्न तबके के बच्चों को भी महंगे स्कूलों जैसी सुविधाएं दी गई हैं, लेकिन कोरोना काल में यह बाधित रहा है और इस खाई को पाटना एक बड़ी चुनौती है। अब बच्चों से परीक्षाएं टालनी हैं या नहीं, यह पूछने से ज्यादा बेहतर यह है कि उनसे पूछा जाए कि उन्होंने इस दौरान क्या सीखा है।
आम आदमी पार्टी सरकार के शिक्षा मॉडल को बनाने में अहम भूमिका निभाने वाली आतिशी ने कहा कि कोरोना का असर काफी कमजोर हो गया है, लेकिन अभी भी यह कई जगहों पर अपना असर दिखा रहा है। ऐसे में अब कोई खतरा लेना उचित नहीं रहेगा। उन्होंने कहा कि जुलाई-अगस्त महीने तक ही स्कूलों को सामान्य तरीके से खोलना संभव हो सकेगा।
इस कांफ्रेंस में टीच फॉर इंडिया के सीईओ शाहीन मिस्त्री और प्रथम एजूकेशन फाउंडेशन की सीईओ रूक्मिणी बनर्जी भी शामिल हुईं और उन्होंने भी बच्चों की शिक्षा पर महत्वपूर्ण विचार रखे। कांफ्रेंस में 'कोविड-19 के बाद शिक्षा में असमानता की चुनौती' विषय पर संवाद किया गया।