चौबीस साल का रजी जब भी शाम को घर लौटता था, घर में खुशहाली छा जाती थी। लेकिन पिछले मंगलवार से भजनपुरा के इस घर में किसी के चेहरे पर मुस्कान नहीं आई है। इसकी वजह है कि दिल्ली दंगों के दिन से रजी अपने घर वापस नहीं लौटा है। उसके मां-बाप भी नहीं हैं। वह अपनी बहन शबाना के पास ही रहकर पास की ही एक दुकान पर काम किया करता था।
बहन शबाना भाई को दर-दर खोज रही है, लेकिन उसे कोई उसके भाई का पता नहीं बता रहा है। दिल में एक अनजाना डर लिए शबाना अस्पताल के शवदाह गृह तक भटक रही है। अभी भी किसी नाले से किसी शव के निकलने की खबर उसे डरा रही है।
शबाना ने बताया कि भजनपुरा के चमनपार्क के उसके इलाके में कोई दंगा नहीं हुआ है। लेकिन उनका भाई उसी दिन से आज तक घर वापस नहीं लौटा है। वे पुलिस से भी बार-बार अपील कर रही हैं लेकिन उनके भाई के बारे में किसी को कोई खबर नहीं है।
उन्होंने बताया कि उनके इलाके में केबल काट दी गई है। किसी को कुछ पता नहीं चल पा रहा है कि बाहर क्या चल रहा है। उन्हें कुछ पता नहीं है कि जब वे शाम को घर जाएंगी, और बच्चे अपने मामू के बारे में उनसे पूछेंगे तब उनके पास क्या जवाब होगा।
चौंतीस साल के दीपक अब इस दुनिया में नहीं हैं। बिहार के आरा से आकर एल्युमिनियम की एक दुकान पर नौकरी किया करते थे। दंगे के दिन वे अपने दो मजदूर दोस्तों के साथ कहीं जा रहे थे। इसी बीच एक भीड़ ने उन्हें घेर कर दीपक पर गोली चला दी। दोस्त किसी तरह अपनी जान बचाकर भाग निकले।
जब तक वापस आकर दोस्त की तबियत देखते, वह दुनिया से जा चुका था। उसके पीछे तीन बच्चे और पत्नी रह गए हैं। खुद भी एक मजदूर की तरह जिंदगी जीने वाले उनके पिता और भाई उनके शव की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
मोहसिन की दो महीने पहले ही शादी हुई थी। मोहसिन अब इस दुनिया में नहीं हैं। पत्नी शाजिया अस्पताल के शवदाह गृह के बाहर उनके शव को पाने की प्रतीक्षा कर रही हैं। दर्द का आलम यह है कि उनकी जुबान से शब्द नहीं निकल रहे हैं और किसी के कुछ पूछने पर आंखों से आंसू निकल पड़ते हैं।
मंत्री ने किया शव ले जाने की व्यवस्था
शवदाह गृह के बाहर हर आंख की अपनी कहानी है। लोग किसी तरह अपनों का शव लेकर यहां से जल्द से जल्द निकल जाना चाहते हैं। लेकिन उनकी शिकायत है कि पुलिस उन्हें सहयोग नहीं दे रही है। दूर शहरों के लोगों की सहायता के लिए दिल्ली सरकार के मंत्री राजेंद्र पाल गौतम गाड़ी उपलब्ध करवा रहे हैं।