सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या विवाद पर नौ नवंबर 2019 को अपना फैसला सुनाया था। फैसले में ही राममंदिर निर्माण के लिए तीन महीने की समय सीमा के अंदर एक बोर्ड गठित करने की बात कही गई थी। आठ फरवरी को यह समय सीमा पूरी हो रही थी, इसलिए सरकार को यह काम इससे पहले ही करना था। लेकिन जिस तरह से बुधवार को प्रधानमंत्री ने इस मुद्दे पर पक्ष रखा है, इस फैसले को भी राजनीतिक नजरिये से देखा जा रहा है।
दिल्ली की सत्ता से भाजपा पिछले 22 साल से बाहर है। इस बीच उसने अपने करिश्माई नेताओं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के नेतृत्व में अपना विस्तार देश के अनेक राज्यों तक कर लिया है। लेकिन इसी बीच मोदी और अमित शाह के होने के बावजूद वह दिल्ली की सत्ता तक नहीं पहुंच पाई।
रामजन्मभूमि आंदोलन में अहम भूमिका निभाने वाले विश्व हिन्दू परिषद (विहिप) ने इस फैसले का स्वागत किया है। विहिप नेता डॉक्टर सुरेंद्र जैन का कहना है कि केंद्र सरकार को यह काम दी गई समय सीमा में ही करना था, इसलिए इस पर विवाद खड़ा करना बेबुनियाद है। उन्होंने कहा कि इस फैसले को वही लोग राजनीति के चश्मे से देख रहे हैं जिन्होंने इस फैसले को रोकने के लिए पूरी कोशिश की थी।
डॉक्टर सुरेंद्र जैन ने कहा कि इस बोर्ड में एक दलित समुदाय के व्यक्ति के होने को अनिवार्य कर सरकार ने सामाजिक एकता को अद्भुत संदेश दिया है। इस निर्णय का पूरे देश में बड़ा सन्देश जाएगा और इससे हिंदू समाज को एक करने में सहायता मिलेगी।