हाजी मस्तान की बॉलीवुड की कई हस्तियों के साथ अच्छे रिश्ते थे
- फोटो : SUNDER SHEKHAR BBC Hindi
तीन साल बाद गालिब जेल की सजा काट कर वापस लौटा। उसके पास एक फूटी कौडी भी नहीं थी। मस्तान गालिब को मदनपुरा की एक झोपडी में ले गए जहां उन्होंने उसे वो सोने के बिस्कुट से भरा लकडी का बक्सा दिखाया, जो अभी तक खोला तक नहीं गया था और उनके पास सुरक्षित था। जैदी बताते हैं, ''गालिब सोने के बिस्कुटों से भरा बक्सा देख कर अवाक रह गया। गालिब ने पूछा, तुम चाहते तो इन बिस्कुटों को लेकर फरार हो सकते थे। मस्तान ने जवाब दिया, मेरे पिता ने मुझे सिखाया था कि तुम हर एक से बच सकते हो, लेकिन ईश्वर से कभी नहीं।''
''ये सुनते ही गालिब की आखों में आँसू आ गए। उसने कहा कि मैं इस बक्से को तभी स्वीकार करूंगा, अगर तुम इसको बेच कर मिलने वाली रकम का आधा हिस्सा मुझसे लोगे और इस पेशे में मेरे 'पार्टनर' बन जाओगे। मस्तान ने इसके जवाब में अपना हाथ गालिब के सामने बढा दिया।'' सोने के बिस्कुटों के इस बक्से ने हाजी मस्तान की जिंदगी बदल दी और वो रातों-रात लखपती बन गये। उन्होंने अपनी नौकरी छोड दी और तस्करी को अपना फुल टाइम पेशा बना लिया।
गुंडे की पिटाई
मस्तान की इज्जत में और इजाफा तब हुआ जब उन्होंने 'मझगांव डॉक' पर कुलियों से हफ्ता वसूल करने वाले स्थानीय गुंडे शेर खां पठान की पिटाई करवा दी। बाद में अमिताभ बच्चन की मशहूर फिल्म 'दीवार' में इस दृश्य को फिल्माया गया। हुसैन जैदी बताते हैं, ''मस्तान ने सोचा कि एक बाहरी शख्स जो कि डॉक में कुली भी नहीं है, किस तरह वहां आ कर मजदूरों से हफ्ता वसूल कर सकता है। अगले शुक्रवार को जब शेर खां हफ्ता वसूलने वहाँ पहुंचा तो उसने पाया कि हफ्ता देने वालों की लाइन से दस लोग गायब हैं।''
थोडी देर बाद इन्हीं लोगों ने डंडों और लोहे के रॉड्स से शेर खाँ और उसके आदमियों पर हमला कर दिया और उनको पीट पीट कर भगा दिया। ''दीवार में ये दृश्य एक गोदाम में फिल्माया गया था जब कि वास्तव में ये लडाई 'मझगांव डॉक' के सामने वाली सडक पर हुई थी। इस घटना के बाद कुलियों के बीच मस्तान का सम्मान बहुत बढ़ गया था।''
'गैंग्स्टर' वर्दराजन मुदालियार से दोस्ती
बंबई के नामी 'डॉन' होने के बावजूद हाजी मस्तान ने खुद कभी पिस्टल नहीं पकडी और न ही अपने हाथ से कभी गोली चलाई। उन्हें जब भी कभी ऐसे काम की जरूरत हुई, उन्होंने एक दूसरे 'गैंग्सटर' वर्दराजन मुदालियार और करीम लाला का सहारा लिया। वर्दा भी मस्तान की तरह तमिल था और वरसोवा, वसई और विरार इलाकों में पैठ रखता था। वर्दा से हाजी मस्तान के संपर्क में आने की भी एक दिलचस्प कहानी है।
हुसैन जैदी बताते हैं, ''स्मगलर' को जरूरत होती है उन लोगों की जो उसकी तरफ से मारपीट कर सकें और माल इधर से उधर ले जाने में मदद कर सके।'' ''एक बार वर्दा को 'कस्टम्स डॉक' इलाके से 'एंटीना' चुराने के आरोप में पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। पुलिसवालों ने कहा कि अगर उसने चोरी के माल को बरामद नहीं करवाया तो वो उसकी पिटाई करने के लिए मजबूर हो जाएंगे।''
''वर्दा 'आजाद मैदान लॉक अप' में ये सोच ही रहा था कि अब क्या किया जाए, कि एक सफेद सूट पहने शख्स,जिसकी उंगलियों में 555 की सिगरेट फंसी हुई थी, सीधे सीखचों की तरफ बढ आया। उसे किसी पुलिस वाले ने नहीं रोका। मस्तान ने वर्दा के बिल्कुल नजदीक आकर तमिल में कहा, 'वणक्कम थलाएवार' यानी 'नमस्कार मेरे मालिक।''
वर्दराजन मस्तान का ये संबोधन सुन कर आश्चर्यचकित हो गया। उसने सपने में भी नहीं सोचा था कि एक इज्जतदार सेठ उस जैसे गुंडे को इतनी इज्जत देगा। मस्तान ने उससे तमिल में ही कहा, चुराए हुए माल को वापस कर दो। मैं ये सुनिश्चित करूंगा कि तुम बहुत पैसा कमाओ। वर्दा इस प्रस्ताव को अस्वीकार नहीं कर पाया। वर्दा को जेल से तुरंत रिहा कर दिया गया और उस के बाद से वो मस्तान के सभी 'डर्टी' काम करने लगा।
मस्तान के बारे में तरह तरह की कहानियां
80 का दशक आते-आते मस्तान की ठसक में काफी कमी हो गई थी, लेकिन तब भी उसके बारे में लोगों के बीच तरह तरह की कहानियां फैली हुई थीं, जो कि जाहिर है सच नहीं थीं। मस्तान को नजदीक से जानने वाले मशहूर उर्दू पत्रकार खालिद जाहिद जब वो एक बार हाजी मस्तान के साथ बनारस गए थे, तब का एक दिलचस्प किस्सा सुनाते हैं।
वे कहते हैं, ''हम लोग दालमंडी इलाके में एक सस्ते से होटल में ठहरे हुए थे। तभी लोगों को पता चल गया कि वहां हाजी मस्तान आए हुए हैं। मिनटों में ही वहां करीब 3000 लोग जमा हो गए। मैं पत्रकार था। मैंने सोचा, मैं क्यों न नीचे उतर कर लोगों को बीच जा कर ये जानने की कोशिश करूं कि वो हाजी मस्तान के बारे में क्या सोचते हैं?''
''वहां लोगों ने मुझे बताया कि हाजी मस्तान एक ऐसे बंगले में रहता है जिसमें 365 दरवाजे हैं। हर रोज वो एक नए दरवाजे से बाहर निकलता है, जहां एक कार उसका इंतजार करती है। वो सिर्फ एक बार उस कार का इस्तेमाल करता है और उसे बेच कर मिलने वाले पैसों को गरीबों में बांट देता है।''
''वास्तविकता ये थी कि मस्तान उस समय 15 साल पुरानी फियेट कार इस्तेमाल कर रहे थे। उनके पास बंगला जरूर था लेकिन इतना बडा नहीं जिसमें 365 दरवाजे हों। मैंने वापस आकर अपने अखबार में इस विरोधाभास को दिखाते हुए असली और नकली मस्तान का चित्र खींचा था, जिसे मस्तान ने पसंद नहीं किया था और वो मुझसे चिढ गया था।''
फिल्म अभिनेत्री से शादी
हाजी मस्तान मुंबई की फिल्मी दुनिया से बहुत आकर्षित थे। उन्होंने न सिर्फ कई फिल्में बनाई, बल्कि एक 'स्ट्रगल' कर रही अभिनेत्री से शादी भी कर ली। हुसैन जैदी बताते हैं, ''दरअसल मस्तान अपनी जवानी के दिनों में मधुबाला के दीवाने थे और उनसे शादी करना चाहते थे। लेकिन तब तक मधुबाला का निधन हो चुका था। अगर वो जीवित भी होतीं तो भी मस्तान से कतई शादी नहीं करती।''
''उन दिनों मुंबई मे मधुबाला जैसी दिखने वाली एक अभिनेत्री काम कर रही थीं। उसका नाम वीणा शर्मा उर्फ 'सोना' था। मस्तान ने उन्हें शादी का पैगाम भिजवाया, जिसे उन्होंने तुरंत स्वीकार कर लिया। उन्होंने सोना के लिए जुहू में एक घर खरीदा और उनके साथ रहने लगे।'' धीरे धीरे मस्तान ने मुंबई के वीआईपी सर्किल में जगह बना ली और लोग उनके तस्करी वाले दिनों को भूलने लगे। हाजी मस्तान की पहली पत्नी से तीन बेटियां थीं बाद में उन्होंने एक शख्स सुंदर शेखर को गोद ले लिया।
सुंदर शेखर बताते हैं, ''फिल्मी दुनिया के कई लोग बाबा के निकट थे। उनमें से प्रमुख थे राज कपूर, दिलीप कुमार और संजीव कुमार। 'दीवार' बनने के दिनों में उसके लेखक सलीम और अमिताभ बच्चन बाबा से अक्सर मिलने आया करते थे, ताकि वो उस किरदार की गहराई तक जा सके। बाबा के बाल हमेशा पीछे की तरफ मुडे होते थे। अगर कोई उनसे अंग्रेजी में बात करता था तो वो उससे बार-बार 'या, या' कहा करते थे।''
नए गैंगों के उदय से हुई ताकत में कमी
80 के दशक की शुरुआत में हाजी मस्तान की ताकत में कमी आना शुरू हो गई थी, क्योंकि मुंबई अंडरवर्ल्ड में नई ताकतें भरना शुरू हो गई थीं। खालिद जाहिद बताते हैं, ''उनके बीच कई नए 'गैंग' तैयार हो गए थे और उनकी कदर कीमत बहुत ज्यादा बढ गई थी। मैं उन लोगों के नाम नहीं लेना चाहता, लेकिन इन नए 'गैंग्स' ने हाजी मस्तान की प्रासंगिकता को बिल्कुल कम कर दिया था।'' 1974 में इंदिरा गांधी ने हाजी मस्तान को पहली बार 'मीसा' के अंतर्गत गिरफ्तार करवाया था। 1975 में आपातकाल के दौरान भी हाजी मस्तान को सीखचों के पीछे रखा गया।
मौत पर नहीं पहुंचे फिल्मी कलाकार
उस समय के चोटी के 'क्रिमिनल' वकील राम जेठमलानी की सेवाएं लेने के बावजूद उनकी रिहाई नहीं हो पाई थी। जेल से छूटने के बाद उनकी जयप्रकाश नारायण से मुलाकात हुई थी और इसी वजह से उनका राजनीति में आने का मार्ग प्रशस्त हुआ और उन्होंने 'दलित मुस्लिम सुरक्षा महासंघ' नाम की एक पार्टी भी बनाई। लेकिन ये पार्टी कुछ खास नहीं कर सकी।
हुसैन जैदी कहते हैं, ''हर अपराधी एक 'स्टेज' के बाद सफेदपोश बनने की तमन्ना रखता है। हाजी मस्तान भी इसके अपवाद नहीं थे। उन्होंने एक पार्टी बनाई जिसके बारे में उनकी सोच थी कि वो एक दिन शिव सेना का स्थान ले लेगी। लेकिन ऐसा हो नहीं पाया।''
9 मई, 1994 को 68 वर्ष का आयु में दिल का दौरा पडने से उनकी मौत हो गई। हमेशा फिल्मी हस्तियों के इर्दगिर्द घूमने वाले मस्तान की मौत पर सिवाए मुकरी के किसी फिल्मी हस्ती ने उनके घर पर जाकर शोक नहीं व्यक्त किया।