बात तब की है, जब ग्रेजुएशन करने के बाद अहमदाबाद में यूपीएससी की तैयारी बीच में ही छोड़कर मैं पत्रकारिता की पढ़ाई कर रही थी। डिग्री पाने से पहले की जाने वाली रिसर्च के लिए मुझे घुमंतू आदिवासियों के बीच जाकर उनकी दिनचर्या को समझना था।
तकरीबन दो महीने तक मैं उनके साथ रही। उनके साथ खाना, नहाना और वे सभी काम, जो वे अपनी जिंदगी में करते हैं, मैंने भी किए। उनका पिछड़ापन किसी को भी आंखे झुकाने पर मजबूर कर सकता था। आजाद भारत की इतनी शर्मनाक तस्वीर मैंने पहले कभी नहीं देखी थी। पर यह तो महज एक झलक भर थी, बंजारों की इससे भी बुरी स्थिति से वाकिफ होना बाकी था।
बंजारों की जिंदगी में दिलचस्पी लेने के बाद मैं एक-एक करके इनके सभी समुदायों से मिल रही थी। मैं दक्षिण गुजरात में इनकी ढाई दर्जन से अधिक जातियों की अलग-अलग दास्तान समेटने की कोशिश में लगी थी। तभी किसी ने मुझे चोरी-बदमाशी जैसे अपराधों के लिए कुख्यात डफेर समुदाय के बारे में जानकारी दी। दिलचस्पी बढ़ने पर मैंने इन्हें करीब से जानने का निश्चय किया। लेकिन हर कोई मुझे डफेरों से न मिलने की हिदायत दिए जा रहा था।
उस वक्त किसी चौबीस साल की शहरी लड़की का उनके इलाके में जाना कोई सोच भी नहीं पा रहा था। यही वजह थी कि किसी बाल मन की तरह मेरे मन में जिज्ञासा और बढ़ गई। मैं बिना किसी की मदद लिए अकेले दम पर निकल पड़ी डफेर समुदाय की बस्ती ढूंढने। घुमंतू होने के कारण इनका कोई निश्चित ठिकाना नहीं था। बड़ी मुश्किल से एक महिला मुझे उनके डेंगे (बस्ती) तक ले गई। मैं उनके मुखिया से बात ही कर रही थी कि पास में एक महिला अपने रोते नवजात बच्चे पर चिल्ला रही थी। मैंने उससे कहा कि बच्चा रो रहा है, इसे दूध क्यों नहीं पिलाती! उसने जवाब दिया- 'दो दिन से कोई बिल्ली तक नहीं दिखी, जिसे मारकर भूख शांत करके मैं इसे दूध पिलाने लायक हो पाऊं।' उस महिला की यह हालत देख मेरा मन पसीज उठा। मैं सोचने लगी कि लोग इन लोगों से डरते हैं, जो अपने बच्चों को दूध तक नहीं पिला सकते। इस डरावने सच से वास्ता पड़ने के बाद तो घुमंतू बंजारों के लिए काम करने की मेरी रुचि प्रण में तब्दील हो गई।
2010 में विचरता समुदाय समर्थन मंच गठन करने से पहले मैं बंजारा जातियों की सभी तरह से जानकारी जुटाकर उनके अधिकारों की लड़ाई लड़ती रही। इनके उत्थान के लिए सबसे पहला काम इनके लिए वोटर कार्ड बनवाना रहा। पर उनका निश्चित ठिकाना न होने की वजह से यह भी आसान नहीं था। राज्य के निर्वाचन आयोग के अधिकारियों से बात करने पर यह तय किया गया कि मानसून में उनके ठिकाने को उनका स्थायी पता माना जाएगा, क्योंकि इसी मौसम में ही वह थोड़ा ठहरते हैं। इसके बाद विभिन्न सरकारी योजनाओं को लाभ उन तक पहुंचाना ही मेरा लक्ष्य बन गया। मैंने अब तक हजारों लोगों के वोटर और राशन कार्ड बनवाए हैं। बीते गुजरात चुनाव में राज्य की दोनों प्रमुख पार्टियों ने पहली बार उनकी सुध ली।
मैंने राजनेताओं पर उनके लिए वायदे करने का दबाव बनाया। लोगों से अपनी संस्था को मिलने वाली मदद के सहारे मैं फिलहाल इन बंजारा जातियों के लिए उनके मानवाधिकार, शिक्षा, उनके पारंपरिक व्यवसाय और आवास के लिए प्रयासरत हूं। मैं चाहती हूं कि करोड़ों की आबादी वाले राज्य में मानवता के स्तर से नीचे जीवन यापन कर रहे इन बेसहारा लोगों को एक औसत जिंदगी तो नसीब हो।