फैजाबाद कोर्ट ने भी कहा, वहां हिंदू मंदिर का कोई सुबूत नहीं: मुस्लिम पक्ष
दोपहर ढाई बजे के बाद मुस्लिम पक्ष के वकील राजीव धवन की दलीलें: डेढ़ घंटे का वक्त मिला
राजीव धवन: धर्मदास ने केवल ये साबित किया कि वे पुजारी है न कि गुरु। इसके अलावा हिंदू महासभा की तरफ से सरदार रविरंजन सिंह, दूसरी विकास सिंह, तीसरा सतीजा और चौथा हरि शंकर जैन के सबूत दिए गए हैं। इसका मतलब है महासभा 4 हिस्सों में बंट गया है, क्या दूसरा महासभा इसका समर्थन करता है? इसके अलावा उन्होंने रंजीत कुमार को जवाब देते हुए कहा कि उन्होंने पार्टी न बनने का सवाल किया, लेकिन क्या हम किसी को पार्टी बनाएंगे?
राजीव धवन: ये वायरल हो गया है कि मैंने कोर्ट में नक्शा फाड़ा, लेकिन मैंने ये कोर्ट के आदेश पर किया। मैंने कहा था कि मैं इसे फेंकना चाहता हूं तब चीफ जस्टिस ने कहा कि तुम इसे फाड़ सकते हो। इसपर चीफ जस्टिस ने कहा कि हमने कहा था कि अगर आप फाड़ना चाहें तो फाड़ दें। हिंदू पक्षकारों ने कुरान के हवाले से जो दलीलें दी हैं, वे आधारहीन हैं। हम अपनी जमीन पर कब्जा वापस चाहते हैं। जिन कागजातों की बात हो रही है, उसके चार-चार मतलब हैं। पहला उर्दू, फिर हिंदी जो जिलानी की तरफ से हुआ, फिर एक हिंदी जो हाईकोर्ट जस्टिस अग्रवाल की ओर से किया गया। 2017 में चौथा अनुवाद हुआ। हिंदू पक्ष नवंबर तक क्या कर रहा था? हमने कोर्ट के कहने पर ट्रांसलेशन किया था और कोर्ट में जमा किया था।
जस्टिस चंद्रचूड़: इसपर आपत्ति ये है कि उस ट्रांसलेशन में कुछ ऐसे शब्द हैं, जो असली रूप में हैं ही नहीं।
राजीव धवन: 6 दिसंबर, 1992 को जो नष्ट हुआ, वो हमारी प्रॉपर्टी थी। वक्फ संपत्ति का मतवल्ली ही रखरखाव का जिम्मेदार होता है, उसे बोर्ड नियुक्त करता है। अयोध्या को अवध या औध लिखा गया है, जिसकी जांच सरकार के द्वारा की गई थी।
जस्टिस चंद्रचूड़: अगर हम आपके आधार को देखें तो ये ओनरशिप के कागजात नहीं दर्शाता है।
राजीव धवन: पीएन मिश्रा ने अनुवाद को जायज ठहराया और एक पैरा पढ़ा, लेकिन हम उन्हें पहले सुन चुके हैं। बाबर के द्वारा मस्जिद के निर्माण के लिए ग्रांट और लगान माफी देने के दस्तावेज हैं।
जस्टिस चंद्रचूड़: ग्रांट से आपके मालिकाना हक की पुष्टि कैसे होती है?
राजीव धवन: जमींदारी और दीवानी के जमाने को देखें तो जमीन के मालिक को ही ग्रांट मिलती थी। इनकी दलील मूर्खतापूर्ण है क्योंकि इनको भूमि कानून की जानकारी नहीं है।
पीएन मिश्रा: मैंने भू कानून पर दो किताबें लिखी हैं और मेरे काबिल दोस्त कह रहे हैं कि मुझे कानून नहीं पता है।
राजीव धवन: आपकी किताबों को सलाम, आप उन पर पीएचडी भी कर लें।
राजीव धवन: यात्रियों की किताबों के अलावा इनके पास टाइटल यानी मालिकाना हक का कोई सुबूत नहीं है। इनकी विक्रमादित्य मंदिर की बात मान भी लें तो भी ये रामजन्मभूमि मंदिर की दलील से मेल नहीं खाता। 1886 में फैजाबाद कोर्ट कह चुका था कि वहां हिंदू मंदिर का कोई सुबूत नहीं मिला। हिंदुओं ने उसे चुनौती भी नहीं दी। हिंदू मंदिर का कोई सुबूत ही नहीं है। 1886 में कमिश्नर ने कहा था कि हिंदुओं के पास इसका अधिकार नहीं है। अगर हिंदू पक्ष 1885 से टाइटल साबित करने में सक्षम हैं, तो मैं इसके जवाब में दो शताब्दियों से अधिक पहले से इस जगह का मालिक हूं।
राजीव धवन: आक्रमणकारियों की बात हो तो सिर्फ नादिर शाह, तैमूर लंग, चंगेज ख्रान और अंग्रेज ही नहीं बल्कि आर्यों तक जाना होगा। ये लोग सिर्फ एक खास तरह के लोगों को ही आक्रमणकारी मानते हैं। आर्यों को आक्रमणकारी मानने से उनको परहेज है। जब मीर कासिम आया तो भारत एक देश नहीं बल्कि टुकड़ों में था। शिवाजी के समय राष्ट्रवाद की धारणा बढ़ी।
जस्टिस चंद्रचूड़: नक्शे से लगता है कि राम चबूतरा अंदर था। हिंदुओं की वहां तक पहुंच भी थी।
राजीव धवन: ये गलत धारणा है। आपने शायद नक्शा गलत पकड़ा हुआ है। अब देखें मस्जिद के दोनों ओर कब्रिस्तान है और हमारी मस्जिद यहां से शुरू होती है। चबूतरा बाहरी अहाते में ही है। चबूतरा भी मस्जिद का हिस्सा है, सिर्फ इमारत ही नहीं बल्कि पूरी जगह ही मस्जिद का हिस्सा है। मस्जिद थी और हमें पुनर्निर्माण का अधिकार है। इमारत भले ही ढहा दी गई लेकिन मालिकाना हक हमारा ही है।
राजीव धवन: हम मोल्डिंग ऑफ रिलीफ के तहत बाबरी मस्जिद को फिर से बनाने की मांग कर रहे हैं। मस्जिद को दोबारा बनाने का अधिकार है। भले अभी वहां मस्जिद नहीं है लेकिन अभी भी ये जमीन वक्फ की है। हम बाबरी विध्वंस के पहले की स्थिति चाहते हैं।