राज्यपाल चाहें तो मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को मनोनीत किए जाने वाले लोगों के कोटे से एमएलसी बना दें। पूर्व विधानसभा अध्यक्ष, भाजपा के वरिष्ठ नेता चंद्रकांत पाटील ने अमर उजाला से कहा कि मंत्रिमंडल की सिफारिश को मानना राज्यपाल का अपना निर्णय होगा।
भाजपा को इससे क्या ऐतराज? भाजपा को उद्धव ठाकरे के सामाजिक जीवन वाले व्यक्ति, कैमरामैन या सामना के एडिटर इन चीफ वाले प्रोफेशनल जीवन पर भी कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन यदि राज्यपाल ने 8 दिन के लिए उन्हें एमएलसी मनोनीत न किया या कैबिनेट की सिफारिश पर कोई राय न दी तो? पाटील का कहना है कि यह मामला इतना आसान नहीं है।
उद्धव चुनकर नहीं आना चाहते.....सबसे पिछला दरवाजा पसंद
चंद्रकांत पाटील ने कहा कि शिवसेना नेता और लोकसभा में शिवसेना के नेता विनायक राऊत चाहे जो कहें, लेकिन मुख्यमंत्री उद्धव विधानसभा का चुनाव लड़कर विधानसभा में नहीं आना चाहते। इसके लिए उन्हें अपनी प्रॉपर्टी का ब्यौरा देना पड़ेगा, आपराधिक रिकॉर्ड का हलफनामा देना पड़ेगा।
पाटील का कहना है कि उद्धव जब भी विधानसभा में आएंगे, वह राज्यपाल की तरफ से मनोनीत किए जाने वाले 12 एमएलसी के कोटे से ही चुनकर आना चाहेंगे। हम चाहते हैं कि महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री विधानसभा में चुनकर आए, लेकिन उद्धव को पिछला से पिछला दरवाजा पसंद है।
पृथ्वीराज चव्हाण से अलग मामला....उद्धव ने खुद दो अवसर गंवाए
चंद्रकांत पाटील ने कहा कि 1968 में बिहार विधानसभा में ऐसा हुआ था, जब मुख्यमंत्री छह महीने के भीतर विधानसभा का सदस्य नहीं बन पाए थे। तब उन्होंने इस्तीफा दिया था। नए मुख्यमंत्री ने शपथ ली, तीन दिन बाद नए मुख्यमंत्री ने फिर पुराने सीएम के नाम का प्रस्ताव करके उन्हें मुख्यमंत्री बनावाया।
चंद्रकांत पाटील का कहना है कि यही रास्ता उद्धव के लिए भी बचता है। वह या उनकी पार्टी के नेता कोविड-19 का सहारा न लें। कोविड का संक्रमण 1 मई तक खत्म हो जाएगा। उन्होंने कहा कि पृथ्वीराज चव्हाण के समय से भी तुलना मत कीजिए।
पृथ्वीराज को तो शुरू के चार महीने में सदन का सदस्य बनने का अवसर ही नहीं मिला था। उद्धव को तो दो बार मिला, लेकिन उन्होंने दोनों अवसर गवां दिए।
क्यों राज्यपाल मानें कैबिनेट की बात
चंद्रकांत पाटील मंजे हुए नेता हैं। उन्होंने कहा कि 28 मई को उद्धव का कार्यकाल खत्म हो रहा है। मनोनीत किए जाने वाले एमएलसी के दो रिक्त पद का कार्यकाल 5 जून को खत्म हो रहा है। फिर आप बताइए, बीच के इन आठ दिनों के लिए राज्यपाल क्यों मान लें कैबिनेट की सिफारिश?
पाटील ने कहा कि उच्चतम न्यायालय ने इस संबंध में पंजाब के एक मामले में दिशा निर्देश भी दिया है। कार्यकाल में छह महीने का समय शेष रहने पर मनोनयन से बचने का मार्ग दर्शन है। इसलिए ऐसा करने के लिए संविधान संशोधन की जरूरत पड़ेगी।
उद्धव यदि चाहें तो भी 28 मई को इस्तीफा देकर वैधानिक रूप से एक दिन बाद मुख्यमंत्री पद की शपथ नहीं ले सकते। खैर, अब यह मामला अभी राज्यपाल के पास है। देखिए वे क्या निर्णय लेते हैं।
राज्यपाल यदि कोई निर्णय नहीं लेते, तब भी यह एक निर्णय होगा। तब उद्धव को इस्तीफा देना होगा। 5 जून बाद जब 12 मनोनीत सदस्यों को विधान परिषद में भेजने की बारी आएगी, तब तक का या चुनाव आयोग की तरफ से चुनाव की तारीख घोषित करने का इंतजार करना होगा।