जगद्गुरु श्री कृपालु महाराज की 104वीं जयंती के उपलक्ष्य में उनकी जन्मस्थली श्री कृपालु धाम मनगढ़ में 60वां वार्षिक साधना शिविर जारी है। शिविर में देश-विदेश से हजारों साधक शामिल हुए हैं। भारत की संत परंपरा ने सदियों से धर्म और संस्कृति को जीवंत बनाए रखा है। इसी परंपरा के पांचवें मूल जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज की वाणी और शिक्षाएं आज भी लाखों लोगों को भक्ति के मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा दे रही हैं।
वर्ष 1922 में शरत् पूर्णिमा की मध्यरात्रि में प्रयागराज के निकट मनगढ़ गांव में श्री कृपालु जी महाराज का अवतरण हुआ। इसी रात्रि भगवान श्रीकृष्ण ने अधिकारी जीवों को महारास का दिव्य रस प्रदान किया था। श्री महाराज जी ने भी जीवों को उस दिव्य प्रेम का अधिकारी बनने का मार्ग दिखाया। उनके माता-पिता ने उनका नाम ‘राम कृपालु’ रखा। बाल्यकाल से ही वे अपने सहपाठियों के साथ हरिनाम-संकीर्तन करते थे। आगे चलकर उन्होंने संकीर्तन को युगधर्म के रूप में स्थापित किया।
अल्पायु में ही उन्होंने व्याकरणाचार्य, काव्यतीर्थ, आयुर्वेदाचार्य एवं साहित्याचार्य की उपाधियां प्राप्त कीं। सोलह वर्ष की आयु में वे चित्रकूट के निर्जन वनों में श्रीराधा-कृष्ण प्रेम की भावोन्मत्त परमहंस अवस्था में विचरण करने लगे। बाद में उन्होंने जनसामान्य को रूपध्यान और संकीर्तन के माध्यम से साधना करने का उपदेश दिया।
काशी विद्वत् परिषद के आमंत्रण पर श्री महाराज जी ने 5 से 13 जनवरी 1957 तक पांच सौ विद्वानों के समक्ष लगातार नौ दिनों तक संस्कृत में प्रवचन दिए। शास्त्रों के असंख्य प्रमाणों से युक्त उनके प्रवचनों से प्रभावित विद्वानों ने 14 जनवरी 1957 को मकर संक्रांति के दिन सर्वसम्मति से उन्हें जगद्गुरु की उपाधि से विभूषित किया। पूर्ववर्ती आचार्यों के सिद्धांतों में दिखाई देने वाले विरोधाभासों का शास्त्रसम्मत समाधान प्रस्तुत करने और विभिन्न सिद्धांतों का समन्वय करने के कारण उन्हें जगद्गुरूत्तम की उपाधि भी प्रदान की गई। इसके बाद उन्होंने अनेक देशों में श्रीराधा-कृष्ण के दिव्य प्रेम का संदेश पहुंचाया।
महाराज ने भक्तियोग प्रधान मार्ग का प्रचार करते हुए जीवों को प्रेय मार्ग से श्रेय मार्ग की ओर अग्रसर किया। उनका संदेश था कि सच्चा सुख भगवान को जानने और उनसे प्रेम करने में है। कृपालु भक्तियोग तत्त्वदर्शन का मूल सिद्धांत यह है कि वास्तविक भक्ति मन से होती है। पाठ, जप, उपवास और तीर्थयात्रा तभी सार्थक होते हैं, जब उनमें मन का अनुराग भी सम्मिलित हो और साधक का मन भगवान के प्रति प्रेम से जुड़ा हो।
मन को भगवान में लगाने के लिए उन्होंने रूपध्यान की विधि बताई। इसमें साधक श्रीराधा-कृष्ण और गुरु के स्वरूप का ध्यान करते हुए उनके नाम, गुण, लीला और धाम का स्मरण करता है तथा संकीर्तन के माध्यम से अपनी भक्ति को प्रगाढ़ बनाता है। वेद, उपनिषद, गीता और भागवत के सार को सरल भाषा में प्रस्तुत करने वाले उनके प्रवचन, संकीर्तन और ग्रंथ अमूल्य आध्यात्मिक धरोहर हैं, जो आज भी साधकों को भक्ति के मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं।
महाराज जी ने वृंदावन में प्रेम मंदिर, बरसाना में कीर्ति मंदिर और मनगढ़ में भक्ति मंदिर की स्थापना की। धार्मिक और आध्यात्मिक क्षेत्र में योगदान के साथ उन्होंने जनकल्याण के लिए तीन निःशुल्क चिकित्सालय और तीन निःशुल्क विद्यालय भी स्थापित किए। इन संस्थानों में अब तक 60 लाख रोगियों का निःशुल्क उपचार किया जा चुका है और 60 हजार निर्धन कन्याओं को शिक्षा प्रदान की गई है। इन प्रयासों के माध्यम से आध्यात्मिक संदेश के साथ-साथ समाज के जरूरतमंद वर्गों की सेवा को भी महत्व दिया गया।
वर्ष 1966 से श्री कृपालु धाम मनगढ़ में उनके जन्मोत्सव पर साधना शिविर आयोजित करने की परंपरा चली आ रही है। इसके अतिरिक्त प्रेम मंदिर वृंदावन और कीर्ति मंदिर बरसाना के आश्रमों में भी अंतरराष्ट्रीय भक्तियोग साधना शिविर आयोजित किए जाते हैं, जिनमें देश-विदेश से साधक पहुंचकर आध्यात्मिक साधना और संकीर्तन में भाग लेते हैं।
महाराज ने अपने जन्मदिवस पर साधकों से अश्रुपूरित भाव से भगवान के नाम का संकीर्तन करने का उपहार मांगा था। इसी भावना के अनुरूप एक माह तक चलने वाले शिविर में अहर्निश संकीर्तन होता है। आश्रमवासी बच्चों की नृत्य-नाटिकाएं और लीला-मंचन श्रद्धालुओं के भक्तिभाव को और प्रगाढ़ करते हैं। ‘दानमेकं कलौ युगे’ के सिद्धांत के अनुरूप निर्धनों और ग्रामवासियों को आवश्यक वस्तुएं वितरित की जाती हैं। सभी जातियों, धर्मों और संप्रदायों के लोगों का एक साथ संकीर्तन करना उनके विश्व बंधुत्व के संदेश को साकार करता है और सामाजिक सद्भाव की भावना को मजबूत बनाता है।
अपने 91 वर्षों के जीवन को उन्होंने जीवकल्याण के लिए समर्पित किया। आज के तनावपूर्ण जीवन में मन से भक्ति करने का उनका संदेश और भी प्रासंगिक हो गया है। चित्रकूट के रामनाम संस्कृत विद्यालय के आचार्य अग्निहोत्री के शब्दों में, उनके जैसा संत न भूतो न भविष्यति। जगद्गुरु कृपालु जी महाराज द्वारा प्रज्वलित भक्ति की यह ज्योति आने वाली पीढ़ियों का मार्ग आलोकित करती रहेगी और उनके प्रेम, भक्ति, सेवा तथा विश्व बंधुत्व के संदेश से समाज को निरंतर प्रेरणा मिलती रहेगी।