अयोध्या में भगवान श्रीराम पूर्ण वैभव और प्रतिष्ठा के साथ विराजमान हो रहे हैं। ये दिन देखने का सौभाग्य लगभग 500 से अधिक वर्ष बाद हमें देखने को मिल रहा है। इसमें कइयों का संघर्ष और बलिदान शामिल हैं, ऐसे ही पूर्व निगम सभापति और कारसेवक रहे प्रकाश चित्तौड़ा ने बताया कि विवादित ढांचा गिराने की योजना उज्जैन के कार्यकताओं ने की थी, जो सफल रही।
पूर्व निगम सभापति और कारसेवक रहे प्रकाश चित्तौड़ा ने बताया कि मुझे पांच दिसंबर को विनायक लपालिकर ने बताया कि ढांचा गिराने की योजना चल रही है। आपको उसमें शामिल होना है। मैंने पूछा, कहां और कैसे करेंगे? तो उन्होंने बताया कि सरयू पार ट्रेनिंग चल रही है। सामान किसी बिल्डिंग ठेकेदार से बुलवाया है। जिसमें रेलिंग फांदने के लिए आंकड़े, रस्सी, कुदाली, सब्बल सब औजार हैं। पूछा कौन-कौन है? उसने बताया कि शिवाजी कोटवानी और अन्य लगभग 25-30 लोग हैं। उसमें आपका भी नाम है। इस पर मैंने उनको डांट दिया, गलतफहमी मत पैदा करो।
दल में थे 13 साथी
चित्तौड़ा ने बताया कि हम 3 दिसम्बर को अयोध्या के लिए ट्रेन से रवाना हुए थे। पूरी ट्रेन खचाखच भरी थी। पूरी यात्रा राम मय थी। सभी टिकट खरीदकर गए थे। हम चार को पहुंचे। मेरे साथ कुल 13 साथी थे। जो मेरे दल में शामिल थे। ऐसे सैकड़ों दल बनाए गए थे, मैं दल नायक था। मेरे साथ कुल 13 लोग थे। ईश्वर पटेल, राजेन्द्र साबू, सेवाराम राघवानी, स्व जगदीश लालावत, सेमसन दास, स्व प्रह्लाद यादव आदि।
फुटपाथ की कच्ची ऊबड़खाबड़ जमीन पर सभी सोये
अयोध्या में जबरदस्त अनुशासित भीड़ थी। लगभग पांच लाख कारसेवक देशभर से पहुंचे थे। समिति ने भोजन व्यवस्था की थी। अयोध्या में अच्छी कड़ाके की ठंड भी थी, हमारे साथ लाए गए चादर ढंक कर सोये। सोने के लिए सड़क किनारे घांस बिछाई गई थी, एक रात फुटपाथ की कच्ची ऊबड़खाबड़ जमीन पर सभी सोये। दूसरे दिन शामियाने में जबरन घुस कर जगह बनाई। 6 दिसंबर को प्रात: लगभग साढ़े 9 बजे सरयू से रुमाल में एक मुट्ठी बालू रेत लेकर रैली में चले, चार-चार की पंक्ति में। जो सूचना थी हम उसका पालन करते थे। प्रतिकात्मक रूप से ढांचे के पास एक रेत का टीला बनाना था।
संत प्रतीतराम हुए नाराज
रैली में हमें संत प्रतीतराम उज्जैन निवासी ने बहुत खरी खोटी सुनाई। वे इस व्यवस्था से बहुत नाराज थे। उन्होंने कहा हमने दो महीने ग्राम में सभाएं लीं, प्रवचन किए। सबको विश्वास दिलाया कि हम ढांचा गिराने जाएंगे। कार सेवा करेंगे, अब क्या मुंह दिखाएंगे, लेकिन जब ढांचा गिर गया तब सन्त प्रतीतराम से पूछा कैसा लग रहा है? वे बहुत खुश व आनंदित थे, नाच रहे थे।
उज्जैन से शिवा कोटवानी के नेतृत्व में तैयार हुई टीम ही सबसे पहले 6 दिसंबर को विवादित ढांचा गिराने के लिए घुसी थी। हमने चबूतरे को बनते देखा व श्रमदान भी किया बल्लियों को भी लगाया। बाबा मौर्य गुलाबी कपड़ा लाए व बल्लियों पर ठोक कर टेंट बनाया। हमारे सामने एक व्यक्ति शायद कोई सन्त या पुजारी था वे गोद में रामलला की मूर्ति को उठाकर लाए और टेंट चबूतरे पर स्थपित किया। मुझे पत्रकार लक्ष्मण पटेल मिले, मुझे मंच पर ले गए। तब आचार्य संत धर्मेंद्रजी का जोशीला उत्साह वर्धक प्रवचन हो रहे थे। साध्वी ऋतुंभरा, साध्वी उमा भारती और अन्य कई संत मौजूद थे। बाद में कर्फ्यू लग गया।
यहां 500 रु में एक कमरा लिया। उन्हीं से भोजन सामग्री मांगी। जगदीश लालावत ने भोजन तैयार किया। 11 दिसंबर को पुलिस अनाउंसमेंट से सूचना मिली। तब सभी कार सेवक लाइन बनाकर स्टेशन आए। हम स्टेशन पहुंचे, ट्रेन से उज्जैन के लिए रवाना हुए, लेकिन रास्ते मे बाराबंकी में ट्रेन पर पथराव हो गया। उसका मुकाबला मेरठ व अलीगढ़ के कार्यकतार्ओं ने किया व सबको सुरक्षित किया। उज्जैन स्टेशन से पुलिस ने हमे 12 दिसम्बर को अपने अपने घरों पर पहुंचाया। साथी यादगार के लिए ढांचे की ईंटो को लेकर आए।