उज्जैन में युवाओं को लोक कला से जोड़ने के उद्देश्य से शहर में इन दिनों मालवा के भित्ती चित्रों एवं गायन प्रशिक्षण हेतु सात दिवसीय प्रशिक्षण शिविर मालव लोक कला केंद्र पर आयोजित किया गया है। इसके अंतर्गत दीवारों पर बनाए जाने वाले भित्ति चित्रों के साथ ही जन्म से लेकर मरण तक गाए जाने वाले परंपरागत मालवीय गीतों को सिखाया जा रहा है।
संस्था की सचिव कृष्णा वर्मा ने बताया कि मालव लोक कला केंद्र, युवा वर्ग में लोक कला में नवचेतना जागृत करने के उद्देश्य से प्रशिक्षण कार्यशाला का आयोजन वर्षों से कर रहा है, जिसमें मालव अंचल की लोक कला को एक नई पहचान मिले। 21 मार्च तक मालव लोक कला केंद्र संस्कृति संचालनालय मप्र भोपाल के सहयोग से मालवा के भित्ति चित्रों का प्रशिक्षण प्रदान किया जा रहा है, जिसमें मालवा के वर्ष भर शादी, ब्याह एवं मांगलिक त्योहारों पर बनने वाले लोकचित्रों का प्रशिक्षण एवं साथ में मालवी परंपरा लोक गीतों का प्रशिक्षण हीरामणी वर्मा एवं पल्लवी बेंद्रे द्वारा ऋषि नगर एक्सटेंशन उज्जैन पर दिया जा रहा है। कृष्णा वर्मा के अनुसार, युवा अपनी संस्कृति विरासत को पहचाने और इसके संरक्षण एवं संवर्धन में सक्रिय भूमिका अदा करें। इस उद्देश्य से उक्त प्रशिक्षण मालव लोक कला केंद्र पर दिया जा रहा है।
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जानिए क्या होता है भित्ति चित्र
भित्ति चित्र कला सबसे पुरानी चित्रकला है। प्रागैतिहासिक युग के ऐतिहासिक रिकॉर्ड में पहले मिट्टी के बर्तन बनाये जाते थे। लेकिन कुछ समय बाद लोगों ने मिट्टी का प्रयोग दीवारों पर चित्र बनाने के लिये करने लगे। भित्ति चित्र अभ्यास की जाने वाली ऐसी लोक कला है, जो गांव की औरतों के द्वारा वहां की कच्ची मिट्टी से बनी झोपड़ियों की दीवारों पर गोबर, चाक मिट्टी, गोबर आदि को मिलाकर की जाती है। घर की दीवारें मूर्तियों, जालियों, विविध आकल्पनों और भिति के कलात्मक रूप से सुसज्जित की जाती है।
जातिय विश्वासों के अनुरुप उनके सृजनलोक में प्रकृति, पशु पक्षी, मनुष्य और देवी देवताओं की सहजत अनोपचारिक उपस्थिति और समरस भागीदार होते हैं। दीवारों पर बनाई इन कलाकृतियों में पास पड़ोस का अति परिचित ससांर अपने सामाजिक विश्वासों की ओर बद्धमूल संस्कारों की अकुंठित, सरल और आडम्बरहीन अभिव्यक्ति है। सुदूर आदिवासीय क्षेत्रों में जहां कि सजावट आदि के साधन अपर्याप्त होते थे, लोग वहां प्रचलित विभिन्न त्योहारों व धार्मिक अवसरों के समय अपने घरों की सज्जा हेतु दीवारों में कच्ची मिट्टी द्चारा पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों आदि के आकृतियां बनाकर व उनमें बहुत ही मनोरम रंगों से रंगकर अपने घरों को सजाते हैं।
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जन्म से मरण तक होते हैं मालवी गीत
मालवी गीत मालवा क्षेत्र की मालवी भाषा में गाए जाने वाले लोकगीत होते हैं, जो विभिन्न अवसरों और कार्यों से जुड़े होते हैं, जैसे कि विवाह, फसल, और त्योहार। मालवी गीत विभिन्न विषयों पर आधारित होते हैं, जैसे कि प्रेम, प्रकृति, त्योहार, और सामाजिक जीवन। मालवी गीतों के कई प्रकार होते हैं, जैसे कि पेशा गीत: विभिन्न पेशे के लोग अपना कार्य करते समय जो गीत गाते हैं, जैसे कि गेहूं पीसते समय 'जाँत-पिसाई', छत की ढलाई करते समय 'थपाई', सावन गीत: सावन महीने में झूलों पर झूलते हुए गाए जाने वाले गीत, विवाह गीत: विवाह के समय गाए जाने वाले गीत, खेती गीत: फसल से जुड़े गीत वैसे मालवी गीतों में पारंपरिक मालवी संगीत का प्रयोग होता है, जिसमें ढोल, नगाड़ा, सारंगी और हारमोनियम जैसे वाद्य यंत्रों का उपयोग किया जाता है।