महाकाल की पवित्र नगरी उज्जैन में शिप्रा नदी के तट पर स्थित नृसिंह घाट क्षेत्र का एक अनूठा मंदिर पूरे देश के लिए प्रेरणास्रोत बना हुआ है। आमतौर पर मंदिरों में देवी-देवताओं की पूजा की जाती है, लेकिन यहां हर दिन देश के लिए अपने प्राण न्योछावर करने वाले वीर जवानों और नारी शक्ति की आराधना होती है। स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर यह स्थल राष्ट्रभक्ति और जन-आस्था के अद्भुत संगम के रूप में उभरकर सामने आता है।
इस अनूठी पहल की शुरुआत वर्ष 2008 में पूर्व जज दान सिंह चौधरी ने की थी। उन्होंने देखा कि अक्सर चौराहों पर लगी शहीदों की प्रतिमाएं समय के साथ धूल और गंदगी की शिकार हो जाती हैं और उनकी सुध केवल राष्ट्रीय पर्वों पर ली जाती है। इसी उपेक्षा को समाप्त करने के लिए उन्होंने अपनी सेवानिवृत्ति से मिली राशि को वीरों के सम्मान में समर्पित कर दिया। गुरु नरसिंहानंद महाराज की प्रेरणा और परमानंद महाराज के मार्गदर्शन में शुरू हुई यह छोटी-सी पहल आज एक विशाल मंदिर का रूप ले चुकी है। मंदिर का मुख्य ध्येय यही है कि अमर बलिदानियों को वर्ष के 365 दिन आदर और सम्मान मिले।
परमवीर चक्र विजेताओं से लेकर सेना के दिग्गजों की प्रतिमाएं
इस मंदिर परिसर की सबसे बड़ी खासियत यहां स्थापित करीब 41 फाइबर प्रतिमाएं हैं। परिसर की मुख्य विशेषताएं इस प्रकार हैं-
सेना के दिग्गज: भारत के प्रथम थलसेना अध्यक्ष जनरल के.एम. करियप्पा, फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ और वायुसेना प्रमुख अर्जन सिंह की प्रतिमाएं यहां स्थापित हैं।
परमवीर चक्र विजेता: देश की रक्षा में अदम्य साहस दिखाने वाले 21 परमवीर चक्र विजेताओं की प्रतिमाएं यहां मौजूद हैं।
नारी शक्ति का सम्मान: वीर जवानों के साथ-साथ देश की वीरांगनाओं और नारी शक्ति को भी विशेष स्थान दिया गया है।
प्रेरणादायक जानकारी: प्रत्येक प्रतिमा के साथ वीर योद्धाओं के जीवन, शौर्य और बलिदान का विस्तृत विवरण दर्ज है, ताकि आने वाली पीढ़ी उनके इतिहास से सीख ले सके।
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हर प्रतिमा में बसती है शौर्य की जीवंत कहानी
मंदिर की देखरेख से जुड़े संजय कुमार चौधरी के अनुसार, फाइबर से बनी प्रत्येक प्रतिमा को तैयार करने में लगभग 40 से 45 हजार रुपये की लागत आई है। मंदिर परिसर ‘जय जवान, जय किसान और जय विज्ञान’ की भावना को सहेजे हुए है। संस्थापक परिवार के बाद अब जामोद परिवार इस मंदिर की निस्वार्थ सेवा और व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी संभाल रहा है। शिप्रा के शांत तट पर बना यह शहीदों का मंदिर हर दिन आने वाले श्रद्धालुओं को यही संदेश देता है कि वीरों की शहादत को याद रखना किसी एक विशेष दिन तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि हर दिन उनके आगे नतमस्तक होना हमारा कर्तव्य है।