उसकी बंद होती आंखों में जिंदगी जी सकने की उम्मीद अभी भी बाकी थी, लेकिन असहनीय दर्द से उभारने को उसे हमेशा के लिए चैन की नींद सुला देना ही एकमात्र रास्ता बचा था। वह मरना नहीं चाहता था।
आखिरी वक्त में भी वह मानों कह रहा था कि मुझे रोक लो, लेकिन नम आंखों से हमें उसे विदा करना ही पड़ा। इंदौर के चिड़ियाघर कमला नेहरू प्राणी संग्रहालय में हिमालयी भालू सोनू का ख्याल रखने वाले जीवन दादा ने कुछ ऐेसे, उससे दूर होने का अपना दर्द बयां किया।
उन्होंने बताया कि सोनू करीब ढाई साल से लकवा से पीड़ित था और उसका 70 फीसदी शरीर लकवा मार गया था। इसके बाद उसकी तकलीफ को कम करने के लिए उसे दया मृत्यु देने का फैसला किया गया और शनिवार को उसे एक इंजेक्शन देकर हमेशा के लिए चैन की नींद सुला दिया गया।
लकवे के कारण ढाई साल से कष्टप्रद जीवन जी रहा था सोनू
जीवन दादा बताते हैं कि इसी चिड़ियाघर में ही सोनू का जन्म हुआ था। करीब 33 साल के अपने सफर में वह न सिर्फ चिड़ियाघर के कर्मचारियों का चहेता बन चुका था, बल्कि स्थानीय मीडिया में भी उसे काफी शोहरत हासिल थी, लेकिन आखिरी दिनों में उसकी हालत काफी बिगड़ गई थी।
मैं उसे खाना देता, लेकिन वह खा नहीं पाता था। सिर्फ जब तक मैं वहां पर खड़ा रहता, तो मेरी खातिर वह कुछ खा लेता था, लेकिन दर्द ने उसके जीवन को नाउम्मीदी से भर दिया था।
चिड़ियाघर के प्रभारी डॉ. उत्तम यादव बताते हैं कि हमने उसे बचाने की बहुत कोशिश की, लेकिन हम कामयाब नहीं रहे। उसका 70 फीसदी शरीर ठप पड़ गया था। छह महीने से हालत और ज्यादा खराब हो गई थी। वह पूरी तरह से निशक्त हो चुका था।
न खाता था न रात को सो पाता था
रात में वो सो नहीं पाता था, दर्द के मारे वह क्रंदन करता और उसका ये दर्द देखकर हमें ही नहीं, बल्कि उसके साथी जानवरों को भी तकलीफ होती। वह हिलडुल तक भी नहीं पाता था। दवाएं भी असर नहीं कर रही थीं।
इसके बाद हमने आखिर केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण को लिखा और उसके लिए दया मृत्यु की मांग की, ताकि उसे इस असहनीय दर्द और तकलीफ से निजात दिलाई जा सके।
मंजूरी मिलते ही हमने उसे शनिवार को इंजेक्शन दे दिया। भले ही वह एक जानवर था, लेकिन उससे भी एक रिश्ता बन चुका था। नम आंखों से हमने उसे विदाई दी और मंत्रोच्चार के साथ उसे दफना दिया।
भालू की दया मृत्यु का पहला मामला
45 साल पुराने इंदौर के इस चिड़ियाघर और मध्य प्रदेश के इतिहास में दया मृत्यु का यह पहला मामला है। चिड़ियाघर के प्रभारी डॉ. उत्तम यादव का कहना है कि उनकी नजर में किसी भालू की दया मृत्यु का देश में यह पहला मामला है।
बहन मोंटू भी सदमे में है
डॉ. यादव ने बताया कि सोनू से एक अलग तरह का लगाव हो गया था। जितना उसके जाने का दुख हमें हुआ है, उतना ही दुख उसकी छोटी बहन मोंटू को भी हुआ है। उन्होंने बताया कि इसी चिड़ियाघर में सोनू की एक छोटी बहन मोंटू भी है। वह भी अपने भाई के जाने से सदमे में है।
चिड़ियाघर में रखा जाएगा सोनू का कंकाल
डॉ. यादव ने जानकारी दी कि सोनू के शव को छह महीने बाद खोदकर निकाला जाएगा और उसका कंकाल चिड़ियाघर के सूचना केंद्र में रखा जाएगा।