मैहर जिले के करौंदिया गांव में ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की। फिर चुनावों में नेताओं से वादा भी लिया। इसके बाद भी पुल की उनकी मांग अधूरी ही रही। थक-हारकर ग्रामीणों ने 11 हजार रुपये खर्च कर 11 दिन श्रमदान किया। तब जाकर बांस से ईको पुल बनाकर आवागमन सुगम बना दिया है। पुल के बन जाने से इन गांवों के डेढ़ सौ से अधिक ग्रामीणों को आवागमन में राहत मिली है। इस कदम से ग्रामीणों ने जिला प्रशासन के सामने यह उदाहरण पेश किया है कि अगर इच्छा शक्ति मजबूत हो, तो कोई भी काम किया जा सकता है।
यह मामला मैहर जिले के रामनगर के करौंदिया गांव का है। यह गांव कहने को तो नगर परिषद न्यू रामनगर का हिस्सा है, लेकिन पिछले एक दशक से नगर परिषद यहां के निवासियों के लिए एक पुल तक मंजूर नहीं कर सका है। करौंदिया गांव के निवासी नत्थूलाल पटेल ने बताया कि गांव में करीब डेढ़ सौ लोगों का निवास है, जिनके स्कूल, कॉलेज, खेती और रोजगार के साधन पूरी तरह से बाहरी क्षेत्र पर निर्भर हैं। लेकिन बरसात के दिनों में सड़क की हालत बहुत खराब हो जाती है। नदी के उफान के कारण बच्चे स्कूल नहीं जा पाते, किसान अपने खेतों तक नहीं पहुंच पाते, और मरीज रास्ते के अभाव में घरों में कैद हो जाते हैं। पुल न होने के कारण गांव का जीवन बेहद कठिन हो गया है।
ग्रामीणों ने कई बार जिला प्रशासन को इस बारे में उचित कदम उठाने के लिए आवेदन दिया, लेकिन हर बार उन्हें केवल आश्वासन ही मिला। हाल ही में जिला कलेक्टर ने भी सात दिनों के भीतर रास्ता और पुल की व्यवस्था करने का वादा किया था, लेकिन जमीनी हकीकत में कुछ भी नहीं बदला। गांव के निवासी भूरेलाल पटेल ने बताया कि गांव के सभी लोगों ने मिलकर पहले बांस की लकड़ियां जुटाईं, फिर उसे खड़ा करने में करीब 11 दिन लगे और लगभग 11 हजार रुपये खर्च हुए।