सागर के खेतों में लगी कास पर अब फूल लग रहे हैं।
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मध्यप्रदेश में पिछले करीब 20 दिन से बरसात नहीं हुई है। बरसात न होने से सोयाबीन, मक्का, उड़द, धान की फसलों पर संकट आ गया है। एक ओर, खेतों में होने वाली कास में जल्दी फूल आने से किसानों की चिंता बढ़ गई हैं। किसानों का मानना रहता है कि कास में फूल आना यानी वर्षा ऋतु के विदाई का समय होता है। इस बार कास में फूल जल्द आ गया और बरसात कम हुई है। कम वर्षा को लेकर किसान चिंतित हैं। किसान इंद्रदेव को मनाने में जुटे हैं। बीना में किसानों ने परंपरागत सेहरा नृत्य किया। बुंदेलखंड में ऐसी मान्यता है कि सेहरा नृत्य करने से इंद्रदेव प्रसन्न होते हैं और वर्षा होती है।
रामचरित मानस में भी है कास का उल्लेख
श्री रामचरित मानस में चौपाई में वर्षा ऋतु का वर्णन करते हुए गोस्वामी तुलसीदास जी ने लिखा है 'फूले कास सकल मही छाई, जनु बरसा कृत प्रकट बुढ़ाई' अर्थात कास नामक घास में फूल आ जाने पर वर्षा ऋतु की विदाई का संकेत मिलता है। इसका आशय है कि मानसून के समापन की बेला आ गई है। चौपाई में वर्णन है कि सकल महि छाई अर्थात चहुं ओर कास फूलने पर वर्षा बूढ़ी होने के संकेत मिलते हैं। वर्षा ऋतु के बाद शरद ऋतु के आगमन का संकेत है।
कास में फूल देखकर करते हैं शरद की तैयारी
कास में फूल देखकर ही ग्रामीण इलाकों में परंपरा के तहत वर्षा ऋतु की विदाई मान लिया जाता है। आने वाली ठंड से निपटने की तैयारी में लोग लग जाते थे। कृष्ण जन्माष्टमी तक कास में फूल आ जाते हैं। तब यह माना जाता था कि अब बारिश बूढ़ी हो गई है। इस बार कृष्ण जन्माष्टमी के दो सप्ताह ही पहले कास में फूल आ गए, इसने चिंता बढ़ा दी है। यह भी माना जाता है कि जन्माष्टमी पर बारिश होती है।