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MP: सागर कलेक्ट्रेट में हड़कंप: जनसुनवाई में महिला ने खुद पर छिड़का पेट्रोल, ससुराल वालों और पुलिस से थी परेशान

Tue, 21 Apr 2026 06:01 PM IST
सागर ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, सागर

सार

सागर जिला मुख्यालय पर मंगलवार को जनसुनवाई के दौरान उस समय अफरा-तफरी मच गई जब एक पीड़ित महिला ने खुद पर पेट्रोल छिड़ककर आत्मदाह की कोशिश की।
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महिला को रोकती सुरक्षाकर्मी - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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मध्य प्रदेश के सागर जिले से एक बेहद चौंकाने वाली और सनसनीखेज खबर सामने आई है। मंगलवार को कलेक्ट्रेट में चल रही साप्ताहिक जनसुनवाई उस समय अफरा-तफरी में बदल गई, जब न्याय की गुहार लगाने पहुंची एक महिला ने अचानक अपने ऊपर पेट्रोल छिड़क कर आत्मदाह करने की कोशिश की। महिला को ऐसा करते देख वहां मौजूद अधिकारियों और आम जनता के हाथ-पांव फूल गए।
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सुरक्षाकर्मियों की फुर्ती से बची जान
घटना के वक्त कलेक्ट्रेट परिसर में आवेदकों की भारी भीड़ थी। जैसे ही पीड़ित महिला ने खुद पर पेट्रोल डाला, वहां मुस्तैद पुलिस बल और सुरक्षाकर्मियों ने तुरंत तत्परता दिखाई। महिला माचिस जला पाती, उससे पहले ही पुलिस ने उसे दबोच लिया। सुरक्षाकर्मियों की इस मुस्तैदी से एक बड़ा हादसा होने से टल गया, हालांकि घटना के बाद काफी देर तक परिसर में तनाव और गहमागहमी का माहौल बना रहा।

ससुराल पक्ष पर प्रताड़ना और पुलिस पर लापरवाही के आरोप
पीड़िता ने रोते हुए अपनी आपबीती सुनाई और प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाए। महिला का कहना है कि उसके ससुराल वाले उसे लंबे समय से शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित कर रहे हैं और उसे घर से निकाल दिया गया है। पीड़िता का सबसे बड़ा आरोप पुलिस की कार्यप्रणाली पर था; उसका दावा है कि वह बार-बार थाने के चक्कर काटती रही, लेकिन पुलिस ने न तो उसकी शिकायत सुनी और न ही आरोपियों के खिलाफ FIR दर्ज की। इसी लाचारी और सिस्टम की बेरुखी से तंग आकर उसने यह आत्मघाती कदम उठाया।
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प्रशासन ने दिया जांच का आश्वासन
हंगामे के बाद वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों ने महिला को सुरक्षित जगह ले जाकर उसकी बात सुनी। अधिकारियों ने पीड़िता को भरोसा दिलाया है कि उसकी शिकायत पर निष्पक्ष जांच की जाएगी और दोषियों पर कार्रवाई होगी। साथ ही, अब इस बात की भी जांच की जाएगी कि निचले स्तर पर थाने में महिला की सुनवाई क्यों नहीं की गई।
 

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जनसुनवाई की सार्थकता पर उठते सवाल
सागर जिले में जनसुनवाई के दौरान आत्मदाह की कोशिश का यह कोई पहला मामला नहीं है। पिछले एक साल में ऐसी कई घटनाएं सामने आ चुकी हैं। यह घटना सीधे तौर पर प्रशासनिक व्यवस्था और जमीनी स्तर पर हो रही शिकायतों के निपटारे पर सवालिया निशान लगाती है। आखिर क्यों आवेदकों को अपनी बात मनवाने के लिए अपनी जान जोखिम में डालनी पड़ रही है? क्या प्रशासन केवल ऐसी घटनाओं के बाद ही हरकत में आता है?

 

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