दिल्ली के पत्रकार अक्षय सिंह और जबलपुर में मेडिकल कॉलेज के डीन अरुण शर्मा की हालिया 'संदिग्ध मौत' के बाद विपक्षी कांग्रेस मध्य प्रदेश की शिवराज सिंह सरकार पर लगातार सवालिया निशान लगा रही है।
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अब शिवराज सिंह चौहान ने कहा है कि वो मामले की सीबीआई जांच के लिए मध्य प्रदेश हाईकोर्ट को कह रहे हैं। लेकिन मध्य प्रदेश का व्यापमं 'घोटाला' सामने लाने में चार लोगों की भूमिका अहम रही।
इनमें एक पूर्व विधायक, एक सॉफ़्टवेयर के जानकार, एक डॉक्टर और एक सामाजिक कार्यकर्ता प्रमुख हैं। पढ़िए उन लोगों के बारे में जिनकी वजह से ये मामला सुर्खियों में है।
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पारस सकलेचा, पूर्व विधायक
पारस सकलेचा को लोग पारस दादा के नाम से भी जानते हैं। पेशे से शिक्षक पारस सकलेचा रतलाम के मेयर और निर्दलीय विधायक रह चुके हैं। हालाँकि वे पिछला विधानसभा चुनाव हार गए थे।
बतौर विधायक पारस सकलेचा ने 2009 से सदन में मेडिकल दाखिलों के दौरान होने वाली कथित धांधलियों को उठाया था। जुलाई 2014 में व्यापमं मुद्दे पर विधानसभा में स्थगन प्रस्ताव के दौरान जब चर्चा हुई तब मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सदन में कहा था, "जब पारस सकलेचा जी ने 2009 में सवाल पूछे थे तब हमने समिति बनाई थी जिसने छानबीन की और उसके बाद संदिग्ध छात्र पहचाने गए थे।
"पारस सकलेचा ने पीएमटी परीक्षाओं की सीबीआई से जांच कराने की मांग हाईकोर्ट ने 2014 में ख़ारिज कर दी थी। जब साल 2014 में व्यापमं घोटाले की जांच कर रही एसटीएफ ने समाचार पत्रों के जरिए लोगों से सबूतों के साथ सामने आने का आग्रह किया तब पारस सकलेचा हज़ारों कागज़ों को प्रमाण के तौर पर लेकर करीब ढाई घंटे तक अपना बयान दर्ज कराते रहे।
पारस सकलेचा ने बीबीसी से कहा, "मेरी जंग तो आगे भी जारी रहेगी क्योंकि अभी तक पीएमटी और उससे जुड़े व्यापमं घोटाले में बड़े लोगों के ख़िलाफ़ कार्रवाई क्या पूछताछ तक नहीं हुई है"।
आशीष चतुर्वेदी, सामाजिक कार्यकर्ता
दुबले-पतले 26 साल के आशीष चतुर्वेदी के व्हिसल ब्लोअर बनने की कहानी भी दिलचस्प है। करीब छह साल पहले आशीष अपनी कैंसर से पीड़ित माँ का इलाज कराने ग्वालियर के एक अस्पताल पहुंचे। इलाज के दौरान उन्हें कई बार ऐसा लगा कि कुछ नए भर्ती हुए डॉक्टरों को तो डॉक्टरी का ए, बी, सी भी नहीं आता।
धीरे-धीरे इन्होंने वहां पर काम कर रहे डॉक्टरों से दोस्ती की और उसके बाद जो जानकारी मिली इससे उनके होश उड़ गए।एक डॉक्टर ने इन्हे गोपनीयता के वायदे पर बताया, "जब दिल्ली में एक परीक्षा केंद्र पर मेडिकल की परीक्षा हो रही थी तब मैं ग्वालियर के सिनेमा हॉल में बैठ कर एक के बाद दूसरा शो देख रहा था।
"आशीष के अनुसार उसके बाद से उन्होंने व्यापमं की परीक्षाओँ में शामिल लोगों के बीच घुसपैठ कर के सच का पता करने की ठानी। मध्य प्रदेश में कथित डीमेट घोटाले में सबसे पहले आशीष ने ही ग्वालियर में फर्जी परीक्षार्थी होने की शिकायत की थी। इस शिकायत के बाद ही पुलिस हरकत में आई और सिलसिलेवार गिरफ्तारियां हुईं।
आशीष की भूमिका और बाद में लगातार मिलने वाली धमकियों की वजह से अदालत ने स्थानीय प्रशासन को इन्हें सुरक्षा मुहैया कराने के निर्देश दिए। हालांकि सुरक्षा से असंतुष्ट आशीष कहते हैं, "अब तक मुझ पर कुल 14 हमले हो चुके हैं और उसमे से करीब छह मेरे सुरक्षा गार्ड की मौजूदगी में हुए"।
प्रशांत पांडे, तकनीकी जानकार
प्रशांत के बारे में जानकारों की राय है कि इन्हीं के जरिए मध्य प्रदेश की मौजूदा सरकार के कुछ कथित 'बड़े लोगों' के नाम व्यापमं घोटाले से जोड़े जाने लगे।
कुछ साल पहले तक प्रशांत पांडे मध्य प्रदेश की जांच एजेंसियों के साथ काम करते थे क्योंकि कंप्यूटर तकनीक और इससे जुडी तमाम चीज़ों के बारे में उन्हें महारत हासिल है।
बताया जाता है कि ख़ुद प्रशांत संदिग्ध अधिकारियों के कंप्यूटरों की हार्ड ड्राइव से डेटा निकालने में जांच एजेंसियों का सहयोग कर रहे थे। लेकिन प्रशांत के मुताबिक़ उनकी मुश्किलें तभी से शुरू हुईं जब उन्हें खुद कुछ ऐसा डेटा (एक्सेल शीट) मिला जिसमें कई बड़े लोगों के नाम शामिल थे।
इनका दावा है कि जहाँ ये जानकारी सार्वजनिक हुई इन्हे प्रदेश की जांच एजेंसियों ने परेशान करना शुरू कर दिया। पहले इन्हें कुछ दिन हिरासत में रखा गया और बाद में इन पर आईटी एक्ट और आईपीसी की धारा 420 के तहत मामले दर्ज किए गए। फिर प्रशांत को हाईकोर्ट से राहत मिली।
इसके बाद से प्रशांत पांडे सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा भी खटखटा चुके हैं और इन दिनों सुरक्षा कारणों से अपना ज्यादातर समय दिल्ली में ही बिताते हैं।
इंदौर के सामाजिक कार्यकर्ता डॉक्टर आनंद राय ने पीएमटी परीक्षाओं में फर्ज़ी परीक्षार्थियों के बैठने की शिकायत की थी। दो वर्ष पहले इन्होंने आरोप लगाया कि स्थानीय पुलिस इन्हें सुरक्षा नहीं दे रही है। इसके बाद हाईकोर्ट की इंदौर बेंच के निर्देश पर इन्हें सुरक्षा गार्ड दिया गया।
आनंद राय कहते हैं, "जब मैं सरकार के खिलाफ अदालत में गया तब मेरी हर बात का ये कह कर विरोध किया गया कि मैं एक अपराधी हूँ।" राय का शुरू से ही ये मानना रहा है कि एसटीएफ सहित सभी जांच एजेंसियां व्हिसल ब्लोअर्स के खिलाफ रही हैं क्योंकि इन सभी ने मौजूदा सरकार के ख़िलाफ प्रमाण मुहैया कराए हैं।
करीब चार वर्ष पहले आनंद राय चर्चा में तब आए थे जब उन्होंने दवाओं के अनैतिक परीक्षणों और उनमें शामिल सरकारी अस्पतालों के डॉक्टरों की भूमिका पर सवाल उठाए थे।
उनके शोर मचाने के बाद भारत सरकार ने ड्रग ट्रायल पर कड़ा क़ानून बनाया और मामले में कई लोग बर्खास्त हुए और कई निलंबित। आनंद राय ने ही इंदौर की स्थानीय पुलिस को जानकारी दी थी कि शहर के होटलों में फर्जी परीक्षार्थी पहुंचे हुए हैं। दबिश के बाद बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां हुईं।