पिछले चुनाव से अब तक प्रदेश की सियासत उलट-पुलट हो चुकी है। जनता ने 2018 में कांग्रेस को सत्ता दी, वह विपक्ष में बैठी है और विपक्ष में बैठने का जनादेश पाने वाली भाजपा सरकार चलाने लगी। आयाराम-गयाराम की आंधी चली। दावा है कि पहले कभी इतने बड़े पैमाने पर दलबदल और बगावत नहीं हुई थी। पिछले चुनाव के कई हीरो इस चुनाव में जीरो हो चुके हैं। कई नए चेहरे अपनी किस्मत पर चकित हैं। दिग्गजों द्वारा अपनों को सेट करने की कहानियां सामने आ रही हैं। भोपाल संभाग में तेजी से बनते नजर आ रहे नए समीकरण की कहानी दिलचस्प है।
2018 में कांग्रेस की सरकार भले ही आई लेकिन भाजपा तब भी भोपाल संभाग की 25 में 16 सीटें जीत गई थी। बाद के उपचुनाव में एक सीट भाजपा की और बढ़ गई। कांग्रेस आठ ही रह गई। कांग्रेस और भाजपा दोनों ने पिछली बार के कई चर्चित चेहरे बदल दिए हैं। नतीजे में कई जगह बागियों की भरमार है और भितरघात की कैंची चलनी शुरू हो गई है। जानकारों के मुताबिक, भाजपा भितरघात रोक पाई तो न केवल पुराना प्रदर्शन दोहरा सकती है बल्कि जीत का आंकड़ा बढ़ भी सकता है।
वीआईपी सीट : बुधनी, गोविंदपुरा से ज्यादा कड़ी भोजपुर की लड़ाई
भारी न पड़ जाए टिकट काटना
भाजपा ने विधायकों बासौदा से लीना संजय जैन, शमशाबाद से राजश्री सिंह, अष्टा से रघुनाथ सिंह मालवीय और सारंगपुर से कुंवरजी कोठार के टिकट काटे हैं। भोपाल दक्षिण-पश्चिम से पूर्व मंत्री उमाशंकर गुप्ता की जगह भगवान दास सबनानी को मौका दिया है। कई सीटों पर भितरघात के आसार हैं। भोपाल के हूजूर से पूर्व विधायक जितेंद्र डागा के मैदान से हटने से कांग्रेस ने राहत की सांस ली है। भोपाल मध्य भी कांग्रेस के कब्जे में है। यहां सिटिंग विधायक आरिफ मसूद और भाजपा के ध्रुव नारायण सिंह के बीच सीधी लड़ाई नजर आ रही है।
दो मंत्री भी मैदान में, उलझे
कांग्रेस की सबसे सुरक्षित सीट ही दांव पर
भोपाल उत्तर से छह बार के विधायक आरिफ अकील ने स्वास्थ्य कारणों से चुनाव न लड़कर बेटे आतिफ अकील को कांग्रेस का टिकट दिला दिया है। आरिफ के भाई आमिर अकील भी निर्दलीय डटे हैं। भाजपा ने पिछली बार मुस्लिम ही उतारा था, लेकिन कामयाबी नहीं मिली। अब प्रदेश उपाध्यक्ष और पूर्व महापौर आलोक शर्मा पर दांव लगाया है।
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