मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री कमलनाथ के इस्तीफे के बाद भाजपा में अब नई सरकार के गठन को लेकर हलचल तेज हो गई है। 230 सदस्यों वाली मध्य प्रदेश विधानसभा में 23 सदस्यों के इस्तीफे और दो की असामयिक निधन के बाद सदस्यों की संख्या घट कर 205 हो गई है। वहीं भाजपा के पास मौजूदा बहुमत से तीन ज्यादा 106 विधायक हैं। अगर उसके विधायकों में कोई टूट नहीं होती है तो वह आसानी से विश्वासमत हासिल कर लेगी।
मध्यप्रदेश की 230 सदस्यों की विधानसभा में इस समय 23 विधायकों ने इस्तीफा दे दिया है और दो सीटें सदस्यों के आकस्मिक निधन से खाली हुई हैं। इस प्रकार मौजूदा विधानसभा में केवल 205 सदस्य रह गये हैं। इसमें भाजपा के सदस्यों की संख्या 106 और कांग्रेस गठबंधन के सदस्यों की संख्या 99 है।
इस समय सदन में बहुमत का आंकड़ा 103 रह गया है जो भाजपा के पास है। लेकिन जिन 25 सीटों पर उपचुनाव होना है, उनमें किस दल को कितनी सीटें मिलेंगी, उससे यह तय होगा कि मध्यप्रदेश में बनने वाली भाजपा की अगली सरकार सत्ता में कितने दिन टिक पाएगी।
कांग्रेस नेता राशिद अल्वी ने कहा है कि इनमें से ज्यादातर सीटों पर कांग्रेस के ही विधायकों ने जीत हासिल की थी और अगले विधानसभा चुनाव में भी पार्टी इन सीटों पर जीत हासिल करेगी। उन्होंने भरोसा जताया है कि कांग्रेस मध्यप्रदेश में फिर से सरकार बना सकती है। उन्होंने कहा कि अगला उपचुनाव सामान्य नहीं होगा।
जनता के सामने कमलनाथ सरकार के कामकाज और भाजपा की विचारधारा में किसी एक को चुनने का विकल्प होगा। चूंकि जनता ने इन क्षेत्रों में अपने चुने जनप्रतिनिधियों को खरीदे जाते हुए देखा है, वह इस धोखे का बदला अवश्य लेगी और उपचुनाव में कांग्रेस जीत हासिल करेगी।
कांग्रेस नेता ने कहा कि परिस्थितियों को देखते हुए चुनाव आयोग को राज्य में जल्द से जल्द उपचुनाव कराना चाहिए।
वहीं, मध्यप्रदेश से भाजपा नेता प्रभात झा ने कहा कि अब राज्य में उनकी पार्टी की सरकार बनेगी और राज्य में पिछले 15 माह से चल रहा कुशासन खत्म होगा। झा ने कहा कि कर्नाटक में भी इसी तरह की परिस्थिति बनी थी, लेकिन पार्टी ने 15 सीटों में से 13 सीटों पर जीत हासिल कर अपनी सरकार को मजबूती दी थी।
उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि मध्यप्रदेश में भी कर्नाटक की तर्ज पर उपचुनाव में भाजपा बड़ी जीत दर्ज करेगी।
ज्योतिरादित्य सिंधिया का फैक्टर उपचुनाव में कितना असर डालेगा, यह इस मामले का सबसे बड़ा पेंच है। स्थानीय नेताओं का कहना है कि सिंधिया उपचुनाव में भाजपा को बड़ा फायदा पहुंचाने की स्थिति में नहीं हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा के खिलाफ एक जबरदस्त लहर थी, जिसका फायदा कांग्रेस को मिला था।
किसानों का मुद्दा लोगों पर बहुत असर डालने वाला साबित हुआ था। इस क्षेत्र का होने के नाते यह लाभ सिंधिया के खाते में जुड़ गया। अगर सिंधिया इस क्षेत्र में इतने ही प्रभावी होते तो लोकसभा चुनाव में वे खुद अपनी ही सीट क्यों हार जाते।
इस उपचुनाव में भी देश में छाई आर्थिक मंदी, बेरोजगारी और नागरिकता कानून के खिलाफ जनता में पैदा हुई नाराजगी भाजपा के खिलाफ जा सकती है। यही कारण है कि मध्यप्रदेश में होने वाले उपचुनाव को अभी से बहुत कड़ा मुकाबला माना जा रहा है और इसमें किसी भी पार्टी के हाथ बाजी लग सकती है।