देखिए साहब, यह इलाका कोई दिल्ली-मुंबई नहीं है। यहां तो चुनाव सीधे-सीधे जातीय समीकरणों पर लड़ा जाता है। सभी पार्टियां यही करती हैं। ग्वालियर से बीटेक करने वाले 22 वर्षीय छात्र प्रमोद सिकरवार जब तल्खी से यह कहते हैं तो शायद चंबल के इस ऊबड़-खाबड़ इलाके की सच्चाई ही बयान कर रहे होते हैं।
इस सीट पर भाजपा ने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के भानजे अनूप मिश्रा को टिकट दिया है। अनूप मिश्रा के पिता शासकीय सेवा में थे। उन्होंने पहला चुनाव 1990 में गिर्द (अब भितरवार) विधानसभा सीट से बालेंदु शुक्ला जैसे दिग्गज को हराकर जीता था।
भाजपा सरकार में मंत्री भी रहे कई बार सीट बदली लेकिन 2013 में भितरवार सीट से चुनाव हार गए। फिलहाल वे ग्वालियर में रहते हैं। वहीं कांग्रेस प्रत्याशी गोविंद सिंह बीएएमएस डॉक्टर हैं। 1990 में पहली बार लहार विधानसभा सीट से लड़े और लगातार जीतते रहे। प्रदेश में मंत्री भी रहे।
कांग्रेस के प्रदेश उपाध्यक्ष हैं। वहीं बसपा इस चुनाव का सबसे रोचक फैक्टर है। बसपा के वृंदावन सिंह सिकरवार दबंग छवि के स्थानीय नेता हैं। मुरैना में मायावती की सभा कराकर उन्होंने अपने प्रभाव का एहसास भी करा दिया है।
मुरैना शहर में कहीं-कहीं आम आदमी पार्टी के प्रत्याशी देवेंद्र अग्रवाल के पोस्टर और बैनर दिखाई देते हैं लेकिन उन्हें कोई गंभीरता से नहीं ले रहा। दरअसल मुरैना श्योपुर सीट पर भाजपा का लंबे समय से दबदबा रहा है। पार्टी नेता अशोक अर्गल यहां से लगातार चार बार सांसद रहे हैं।
इसके बाद वर्ष 2009 के चुनाव में यह सीट मौजूदा भाजपा प्रदेश अध्यक्ष और ग्वालियर सीट से प्रत्याशी नरेंद्र सिंह तोमर ने जीती। यह बात अनूप मिश्रा के पक्ष में जाती है। बसपा और कांग्रेस के प्रत्याशियों का ठाकुर होना उनके लिए फायदे का सौदा साबित हो रहा है।
यह सीट लंबे समय से सुरक्षित रही। वर्ष 2009 में इसे सामान्य सीट बनाया गया। दो लाख ठाकुर, डेढ़ लाख वैश्य, डेढ़ लाख ब्राह्मण और तीन लाख दलित हैं। मिश्रा को उम्मीद है कि उन्हें जीतने में कोई दिक्कत नहीं आएगी।
भिंड से मुरैना के मार्ग में कवारी नदी के बीहड़ किनारे बसे कस्बे अम्बाह में इसलाम खान साफ कहते हैं मुसलिम वर्ग तो कांग्रेस को ही वोट देगा, भले ही कैंडिडेट कमजोर हो। लेकिन दुकानदार पी डी जैन कहते हैं कि इस बार भाजपा की लहर है, मिश्रा को ब्राह्मण, वैश्य वोटों के संग मोदी फैक्टर का फायदा भी तो है।
मोबाइल की दुकान चलाने वाले रामकुमार कहते हैं, हम तो चाहते हैं मोदी पीएम बनें, हमारा वोट उसी तरफ है। बैरियर चौराहे पर छात्र अनुज तिवारी कहते हैं हम तो भाजपा को वोट देंगे। चुनाव जीतकर किसी को कुछ करना तो है नहीं। इस बार भाजपा को आजमा लेते हैं। वहीं मुरैना में अपने कार्यालय में बैठे सिकरवार कहते हैं सब बाहरी कैंडिडेट हैं, मैं स्थानीय हूं तो इसका फायदा तो मुझे मिलेगा ही।
राम प्रसाद बिस्मिल और मुरैना
कम ही लोग जानते होंगे कि आजादी की लड़ाई में शहीद होने वाले क्रांतिकारी राम प्रसाद बिस्मिल का संबंध मुरैना जिले के बरबई से था। उनके पूर्वज चंबल इलाके के बरबई से यूपी के शाहजहांपुर में जाकर बस गए थे, जहां 1897 में बिस्मिल का जन्म हुआ। शहर में भिंड रोड से प्रवेश करते ही उनकी स्मृति में बनाया गया म्यूजियम ध्यान खींचता है। उन्होंने 1918 मैनपुरी षड्यंत्र में हिस्सा लिया और काकोरी कांड में शामिल रहे। तब मुरैना संयुक्त प्रांत का हिस्सा था। 19 दिसंबर 1927 को उन्हें गोरखपुर जेल में फांसी दे दी गई थी।
बसपा फैक्टर ने चुनाव को रोचक बनाया
मुरैना के धूल भरे माहौल में बहुजन समाज पार्टी के वृंदावन सिंह सिकरवार ने खासा गरमा दिया है। शहर में जगह-जगह उनकी चर्चा भी है। मुख्य चौराहों पर बड़े-बड़े होर्डिंग लगे दिखाई देते हैं। पूर्व में कांग्रेस प्रत्याशी गोविंद सिंह के सहयोगी रहे सिकरवार अब उन्हीं के लिए बड़ी आफत बन गए हैं। ठाकुर वोटरों के कटने की वजह से कांग्रेस और बसपा दोनों ही हल्के पड़ते दिख रहे हैं।