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मध्यप्रदेश: मालवा-निमाड़ में दांव पर दिग्गजों का सियासी भविष्य, भाजपा की अग्निपरीक्षा

Tue, 27 Nov 2018 06:57 PM IST
चुनाव डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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भाजपा-कांग्रेस
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मध्यप्रदेश विधानसभा चुनावों में बुधवार को मतदान होना है। यह मतदान मालवा-निमाड़ अंचल के कई वरिष्ठ राजनेताओं का सियासी भविष्य भी तय करेगा। सत्ता की चाबी कहे जाने वाले इस क्षेत्र में भाजपा ने अपनी मजबूत पकड़ बरकरार रखने के लिये जोर लगाया है, तो कांग्रेस ने पिछले 15 साल से सत्तारूढ़ दल के गढ़ में सेंध लगाने की भरसक कोशिश की है। 
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मालवा-निमाड़ अंचल की अलग-अलग सीटों से भाजपा की ओर से चुनावी मैदान में उतरे वरिष्ठ राजनेताओं में पारस जैन (68), अर्चना चिटनीस (54), अंतरसिंह आर्य (59), विजय शाह (54) और बालकृष्ण पाटीदार (64) शामिल हैं । पांचों नेता शिवराज सिंह चौहान की भाजपा सरकार में मंत्री हैं। इनके अलावा, प्रदेश के पूर्व मंत्री और मौजूदा भाजपा विधायक महेंद्र हार्डिया (65) भी इसी अंचल की इंदौर-पांच सीट से फिर उम्मीदवार हैं। 

ये मंत्री मैदान में 

पारस जैन (68)
अर्चना चिटनीस (54)
अंतरसिंह आर्य (59)
विजय शाह (54)
बालकृष्ण पाटीदार (64) 

उधर, कांग्रेस की ओर से मालवा-निमाड़ अंचल में किस्मत आजमा रहे दिग्गजों में चार पूर्व मंत्री-सुभाष कुमार सोजतिया (66), नरेंद्र नाहटा (72), हुकुमसिंह कराड़ा (62) और बाला बच्चन (54) शामिल हैं। इसी क्षेत्र से चुनाव लड़ रहे दो अन्य वरिष्ठ कांग्रेस नेता-विजयलक्ष्मी साधौ (58) और सज्जन सिंह वर्मा (66) गुजरे बरसों के दौरान अपने अलग-अलग कार्यकालों में सांसद और प्रदेश सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं। 
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कांग्रेस के दिग्गज 

सुभाष कुमार सोजतिया (66)
नरेंद्र नाहटा (72)
हुकुमसिंह कराड़ा (62)
बाला बच्चन (54)
विजयलक्ष्मी साधौ (58)
सज्जनसिंह वर्मा (66) 

मालवा-निमाड़ अंचल की 66 सीटें

कुल 230 सीटों वाली प्रदेश विधानसभा में मालवा-निमाड़ अंचल की 66 सीटें शामिल हैं। पश्चिमी मध्यप्रदेश के इंदौर और उज्जैन संभागों में फैले इस अंचल में आदिवासी और किसान तबके के मतदाताओं की बड़ी तादाद है। मालवा-निमाड़ का चुनावी महत्व इसी बात से समझा जा सकता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के साथ कांग्रेस प्रमुख राहुल गांधी ने भी चुनाव प्रचार के दौरान इस क्षेत्र में बड़ी रैलियों को सम्बोधित किया है। 

 

भाजपा के लिए रास्ता मुश्किल 

सत्ताविरोधी रुझान को लेकर कांग्रेस के आरोपों के बीच सियासी जानकारों का मानना है कि भाजपा के लिये इस बार मालवा-निमाड़ में चुनावी लड़ाई आसान नहीं है। सत्तारूढ़ दल को टिकट वितरण पर अपने ही खेमे में गहरे असंतोष का सामना करना पड़ा है और कुछ बागी नेता निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़कर उसकी मुश्किलें बढ़ा रहे हैं। 

उधर, पिछले 15 साल से सूबे की सत्ता से वनवास झेल रही कांग्रेस मालवा-निमाड़ अंचल में अपना खोया जनाधार हासिल करने की चुनौती से जूझ रही है जबकि यह इलाका एक जमाने में उसका गढ़ हुआ करता था। मालवा-निमाड़ अंचल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की जड़ें भी बहुत गहरी हैं। ऐसे में जानकारों का आकलन है कि इस क्षेत्र में चुनाव परिणाम तय करने में संघ फैक्टर भी अहम भूमिका निभा सकता है। 

साल 2013 के पिछले विधानसभा चुनावों में मालवा-निमाड़ की 66 सीटों में से भाजपा ने 56 सीटें जीती थी, जबकि कांग्रेस को केवल नौ सीटों से संतोष करना पड़ा था। भाजपा के बागी नेता के खाते में एक सीट आयी थी जिसने अपनी पार्टी से टिकट नहीं मिलने के कारण निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा था।

ये हैं वीआईपी उम्मीदवार 

पूर्व मुख्यमंत्री दिग्वियज सिंह के पुत्र और कांग्रेस के विधायक जयवर्धन सिंह अपनी घरेलू सीट राघौगढ़ से कांग्रेस के उम्मीदवार हैं जबकि दिग्विजय के छोटे भाई पूर्व सांसद लक्ष्मण सिंह राजगढ़ जिले की चचौड़ा विधानसभा सीट से कांग्रेस के उम्मीदवार हैं। इन्दौर-तीन विधानसभा सीट से भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय के पुत्र आकाश विजयवर्गीय भाजपा के उम्मीदवार के तौर पर मैदान में हैं। उनके सामने कांग्रेस के पूर्व विधायक और पूर्व मंत्री महेश जोशी के भतीजे अश्विन जोशी किला लड़ रहे हैं। कैलाश विजयवर्गीय इस बार खुद चुनाव नहीं लड़ रहे हैं बल्कि मालवा क्षेत्र में सभी 66 सीटों पर भाजपा का चुनाव प्रबंधन संभाल रहे हैं।

इनके अलावा छतरपुर जिले की राजनगर विधानसभा सीट के परिणाम पर भी सबकी निगाहें लगी हैं। यहां से कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सत्यव्रत चतुर्वेदी कांग्रेस का टिकट नहीं मिलने से अपने बेटे नितिन चतुर्वेदी को सपा के टिकट पर राजनगर सीट से लड़वा रहे हैं। चतुर्वेदी कांग्रेस से बागी होकर अपने बेटे के चुनाव प्रचार में भी सक्रिय हैं।

 
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कांग्रेस-भाजपा के वादे 

चुनाव प्रचार के दौरान कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी लगातार प्रदेश के लोगों से वादा कर रहे हैं कि प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनने के दस दिन के अंदर किसानों का कर्जा माफ कर दिया जायेगा और प्रदेश में युवाओं के रोजगार के लिये विशेष ध्यान दिया जायेगा।

मोदी ने किसानों की बर्बादी के लिये कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि मोदी सरकार 2022 तक किसानो की आय दोगुनी करने के लक्ष्य पर काम कर रही है। उन्होने कहा कि भाजपा के प्रदेश सरकार ने 15 साल और केन्द्र सरकार के चार साल के शासन में बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार दिया गया है।

चौहान ने चुनाव प्रचार में कहा कि 1993 से 2003 तक कांग्रेस के मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के शासन काल में मध्यप्रदेश बीमारू राज्य था और 2003 में भाजपा को बीमारू हालत में प्रदेश मिला था जबकि भाजपा के 15 साल में इसे बीमारू राज्य की श्रेणी से निकाल कर विकसित राज्य बनाया है। उन्होंने मतदाताओं से भाजपा को समर्थन देने की अपील करते हुए प्रदेश को समृद्ध राज्य बनाने का दावा किया।

कुल 2907 उम्मीदवार मैदान में 

मध्यप्रदेश में विधानसभा की 230 सीटों के लिये होने वाले चुनाव के लिये कुल 2907 उम्मीदवार चुनावी मैदान में अपना भाग्य आजमा रहे हैं। इस अहम चुनाव में विपक्षी दल कांग्रेस पिछले 15 साल से सत्तारुढ़ भाजपा को उखाड़ने के लिये प्रयास कर रही है जबकि भाजपा ने लगातार चौथी दफा प्रदेश की सत्ता में आने के लिये अबकी बार 200 पार का लक्ष्य तय किया है।

मध्यप्रदेश में सत्ता में आने की दावेदार मुख्य तौर पर भाजपा और कांग्रेस दो दल हैं और यहां इन्हीं दो राजनीतिक दलों के बीच राजनीतिक जंग होती है। कांग्रेस ने प्रदेश की 229 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं जबकि एक सीट अपने सहयोगी शरद यादव के लोकतांत्रिक जनता दल के लिये छोड़ी है। भाजपा ने सभी 230 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं। आम आदमी पार्टी भी पहली दफा मध्यप्रदेश में चुनावी मैदान में है और उसने अपने 208 उम्मीदवार उतारे हैं। बसपा के 227 और सपा के 51 चुनाव लड़ रहे हैं।

 
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