भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 134 के तहत एक चश्मदीद की गवाही सजा का आधार बन सकती है। एकल चश्मदीद गवाह शुद्ध गुणवत्ता का होना चाहिए। हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस सुजय पॉल तथा जस्टिस पीसी गुप्ता की युगलपीठ ने हत्या के अपराध में आजीवन कारावास की सजा को खारिज करते हुए उक्त आदेश जारी किए।
याचिकाकर्ता मनीष वर्मा की तरफ से दायर क्रिमिनल अपील में अतिरिक्त जिला सत्र न्यायालय द्वारा 7 दिसंबर 2011 को हत्या के आरोपी में आजीवन कारावास से दंडित किए जाने को चुनौती दी गई थी। अभियोजन के अनुसार शिकायकर्ता कविता 14 अक्टूबर 2010 को अपनी मां तथा छोटी बहन के साथ खेत में भूसा काटने गई थी। भूसा लेकर जब वह लौटी तो अपने देवर मनीष को भागते हुए देखा। भागते समय उसके देवर दरवाजे से टकरा गया था, जिसके कारण उसका चश्मा गिर गया था। लैंप लेकर वह मंझोटा में गई तो उसकी बड़ी बहन ललिता की लाश पड़ी हुई थी।
सुनवाई के दौरान युगलपीठ ने पाया कि जिला न्यायालय ने सिर्फ कविता की गवाही के आधार पर अपीलकर्ता को सजा से दण्डित किया है। कविता ने अपनी गवाही में यह बताया था कि अपीलकर्ता सफेद शर्ट और पेंट पहने हुए था। भागते समय टकराने के कारण उसका चश्मा गिर गया था। पुलिस के अनुसार पुलिस ने आरोपी को 22 अक्टूबर 2010 को दोपहर एक बजे गिरफ्तार किया था। पुलिस द्वारा उसके पास से खून लगे गमछे की जब्ती 12.15 बजे बताई गई थी। पुलिस कर्मचारियों ने अपने बयान में आरोपी की गिरफ्तारी भी अलग-अलग स्थान अमरवाड़ा व सागर से करना बताया गया है। चश्मदीद गवाह कविता ने आरोपी द्वारा गमछा पहने होने का उल्लेख नहीं किया था और पुलिस ने घटना में प्रयुक्त हथियार बरामद नहीं किया है। युवक गिरफ्तारी के बाद से न्यायिक अभिरक्षा में है। युगलपीठ ने उक्त आदेश के साथ अतिरिक्त जिला न्यायालय के फैसले को खारिज करते हुए आरोपी को बरी कर दिया।