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Bhopal Gas Tragedy: मॉनिटरिंग कमेटी के वकील को हटाने पर सरकार घिरी, एसीएस मोहम्मद सुलेमान की मुश्किलें बढ़ी

Tue, 09 Jan 2024 03:55 PM IST
रवींद्र भजनी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जबलपुर

सार

भोपाल गैस त्रासदी के पीड़ितों के उपचार और पुनर्वास के संबंध में सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना के आरोपों के मुद्दे पर एसीएस मोहम्मद सुलेमान समेत तीन अधिकारियों की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। हाईकोर्ट ने उन्हें इस मामले में 16 जनवरी को अपना पक्ष रखने के निर्देश दिए हैं। 
 
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मध्य प्रदेश हाईकोर्ट - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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भोपाल गैस त्रासदी के पीड़ितों के उपचार और पुनर्वास संबंधी आदेश का पालन न करने के मामले में अतिरिक्त मुख्य सचिव मोहम्मद सुलेमान और राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र के दो अधिकारियों की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। सरकार ने इन अधिकारियों के खिलाफ लगे अवमानना के आरोपों से मुक्त करने का आवेदन कोर्ट को दिया है। उस पर अगली सुनवाई अब 16 जनवरी को होगी। 

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हाईकोर्ट के जस्टिस शील नागू और जस्टिस विनय सराफ की बेंच अवमानना मामले की सुनवाई कर रही है। इस मामले में न्यायमित्र नमन नागरथ ने कोर्ट को बताया कि सरकार ने मॉनिटरिंग कमेटी को अपना वकील हटाने के निर्देश दिए हैं। इसके बारे में सरकारी वकील ने कोर्ट में जानकारी न होने की बात कही। इस पर बेंच ने उनसे कहा कि सरकार की ओर से मॉनिटरिंग कमेटी के अध्यक्ष को लिखे पत्र के संबंध में सरकार से निर्देश प्राप्त करें और कोर्ट को बताएं।  

क्या है मामला
सुप्रीम कोर्ट ने 2012 में भोपाल गैस पीड़ित महिला उद्योग संगठन सहित अन्य की याचिका की सुनवाई की थी। गैस पीड़ितों के उपचार और पुनर्वास के संबंध में 20 निर्देश दिए थे। इनका क्रियान्वयन सुनिश्चित कर मॉनिटरिंग कमेटी गठित करने के आदेश दिए थे। इस कमेटी को हर तीन माह में अपनी रिपोर्ट हाईकोर्ट के सामने पेश करने को कहा था। साथ ही रिपोर्ट के आधार पर केंद्र और राज्य सरकारों को आवश्यक दिशा-निर्देश दिए जाने थे। याचिका लंबित थी। इस बीच मॉनिटरिंग कमेटी की अनुशंसाओं पर कोई काम न होने का आरोप लगाते हुए अवमानना याचिका दाखिल की गई थी। 
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क्या है अधिकारियों पर आरोप 
सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन नहीं किया जा रहा है। सरकारी अधिकारियों पर आरोप है कि उन्होंने कोर्ट के आदेश की अवहेलना की है। अवमानना याचिका में कहा गया कि गैस पीड़ितों के हेल्थ कार्ड तक नहीं बने हैं। अस्पतालों में आवश्यकता अनुसार उपकरण व दवाएं उपलब्ध नहीं हैं। बीएमएचआरसी के भर्ती नियम तय नहीं होने से डॉक्टर व पैरामेडिकल स्टाफ स्थाई तौर पर सेवाएं प्रदान नहीं कर रहे हैं। इस कारण पीड़ितों को उपचार के लिए भटकना पड़ रहा है। पिछली सुनवाई में हाईकोर्ट की युगल पीठ ने कहा था कि कम्प्यूटीकरण और डिजिटलीकरण की जिम्मेदारी राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र की थी। प्रक्रिया पूरी करने की जिम्मेदारी अतिरिक्त मुख्य सचिव मोहम्मद सुलमान की थी। युगल पीठ ने पूर्व में पारित आदेश का हवाला देते हुए कहा कि आदेश के बाद भी मॉनिटरिंग कमेटी को स्टेनोग्राफर तक उपलब्ध नहीं करवाया है। बीएमएचआरसी को एम्स में नहीं बदला गया। बीएमएचआरसी के लिए स्वीकृत 1,247 पदों में से 498 पद रिक्त पड़े हैं।

राज्य सरकार के रवैये से नाराज था कोर्ट
युगलपीठ ने आदेश में कहा था कि इन अधिकारियों ने गैस पीड़ितों को बेसहारा छोड़ दिया है। सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के आदेश के परिपालन में तत्परता व ईमानदारी से काम नहीं हुआ है। गैस पीड़ितों के प्रति असंवेदनशीलता दिखाई गई है। इस मामले में ढिलाई बरती जा सकती है। युगल पीठ ने अवमानना के तीनों दोषियों को जवाब पेश करने के निर्देश जारी किए हैं। युगल पीठ ने याचिका के अन्य अनावेदकों के खिलाफ अवमानना के आरोप तय करने के आदेश रजिस्ट्री को दिए थे। याचिका पर अगली सुनवाई 16 जनवरी को होगी। 

सरकार ने किया है अधिकारियों का बचाव
सरकार की तरफ से याचिका पर शीघ्र सुनवाई करने तथा दोषी करार अधिकारियों को अवमानना के आरोप से मुक्त करने का आवेदन दायर किया गया था। सरकार के आवेदन पर सोमवार को सुनवाई हुई। इस दौरान न्याय मित्र नमन नागरथ ने कोर्ट को बताया कि सरकार ने मॉनिटरिंग कमेटी के अध्यक्ष को पत्र लिखा है कि नियुक्त अधिवक्ता को हटाए। मॉनिटरिंग कमेटी का खर्च सरकार उठाती है। इस वजह से उसकी तरफ से पैरवी भी सरकार ही करेगी। मॉनिटरिंग कमेटी के अध्यक्ष सेवानिवृत्त जस्टिस वीके अग्रवाल ने इस पर अपनी आपत्ति पेश की है। सरकार की तरफ से उपस्थित महाधिवक्ता ने बताया कि इस संबंध में उन्हें कोई जानकारी नहीं है। युगल पीठ ने नाराजगी व्यक्त की। युगल पीठ 16 जनवरी को ही दोषी अधिकारियों का पक्ष सुनेगी। याचिकाकर्ता की तरफ से अधिवक्ता एनडी जयप्रकाश तथा मॉनिटरिंग कमेटी की तरफ से अधिवक्ता अंशुमान सिंह कोर्ट में उपस्थित हुए।

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