मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में ओबीसी आरक्षण से जुड़ी याचिकाओं की सुनवाई के दौरान महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आया है। चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ की युगलपीठ को बताया गया कि सर्वोच्च न्यायालय में इस मामले से संबंधित दायर पांच याचिकाओं का स्थानांतरण अभी हाईकोर्ट में नहीं हुआ है। इस पर कोर्ट ने निर्देश दिया कि इन याचिकाओं के स्थानांतरण के बाद 13 मई से लगातार तीन दिनों तक इन पर सुनवाई की जाएगी।
सुनवाई के दौरान राज्य शासन की ओर से कोर्ट को यह भी अवगत कराया गया कि ओबीसी आरक्षण मामले के लिए नियुक्त विशेष अधिवक्ता इस चरण में पक्ष प्रस्तुत नहीं करेंगे।
गौरतलब है कि वर्ष 2019 में अशिता दुबे व अन्य द्वारा दायर याचिका में ओबीसी आरक्षण को 27 प्रतिशत किए जाने को चुनौती दी गई थी। इस मुद्दे पर हाईकोर्ट में पक्ष और विपक्ष में 100 से अधिक याचिकाएं लंबित हैं।
आरक्षण के खिलाफ दायर याचिकाओं में तर्क दिया गया है कि सर्वोच्च न्यायालय के इंदिरा साहनी और मराठा आरक्षण संबंधी फैसलों के अनुसार आरक्षण की कुल सीमा 50 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकती। वहीं कुछ याचिकाओं में 87:13 के फार्मूले को चुनौती देते हुए 13 प्रतिशत होल्ड पदों पर आपत्ति जताई गई है। दूसरी ओर समर्थन में दायर याचिकाओं में आबादी के अनुपात में आरक्षण की मांग की गई है।
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उल्लेखनीय है कि पूर्व में राज्य शासन ने इस मामले से जुड़ी याचिकाओं को सुप्रीम कोर्ट में स्थानांतरित कराया था लेकिन 19 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट ने इन्हें पुनः हाईकोर्ट को वापस भेज दिया। सोमवार की सुनवाई में बताया गया कि ओबीसी आरक्षण के विरोध में करीब 70 और समर्थन में लगभग 30 याचिकाएं लंबित हैं।
मंगलवार को हुई सुनवाई में यह भी स्पष्ट किया गया कि अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट में दायर पांच याचिकाएं अभी हाईकोर्ट में ट्रांसफर नहीं हुई हैं। इस पर युगलपीठ ने आवश्यक निर्देश जारी किए। मामले में विपक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता आदित्य संघी, जबकि शासन की ओर से महाधिवक्ता प्रशांत सिंह और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता के.एम. नटराजन पैरवी के लिए उपस्थित हुए।