जैन धर्म से प्रभावित होकर इंदौर में 20 साल की युवती ने संन्यास लेने का फैसला लिया है, लेकिन माता-पिता नहीं चाहते हैं। मामला हाईकोर्ट पहुंचा तो कोर्ट ने कहा कि युवती बालिग है। दीक्षा लेने का फैसला उसका धार्मिक व मौलिक अधिकार है। कोर्ट ने युवती की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए भी कहा है।
इंदौर की युवती ने हाईकोर्ट में इस बारे में याचिका लगाई थी। इसमें उसने कहा था कि उसकी रुचि जैन धर्म में है और वह सांसारिक जीवन त्याग कर जैन साध्वी बनना चाहती है, लेकिन माता-पिता इसके लिए तैयार नहीं हैं। वे लगातार विरोध कर रहे हैं।
याचिका में युवती ने कहा कि सामाजिक दबाव के कारण उसकी धार्मिक स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है और वह अपनी मर्जी से धार्मिक जीवन जीना चाहती है। कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि युवती बालिग है और उसे अपने जीवन का फैसला लेने का अधिकार है। ऐसा करने से उसे रोका नहीं जा सकता है।
बालिग को उसकी रुचि के अनुसार धर्म का पालन करने का अधिकार है और उसे इस अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने युवती के माता-पिता की भावनाओं के प्रति सहानुभूति भी जताई, लेकिन युवती के फैसले पर कहा कि उसके मौलिक व धार्मिक अधिकार की रक्षा पहले है।कोर्ट ने युवती से कहा कि वह जिस क्षेत्र में रहती है, वहां के थाने में सुरक्षा संबंधी आवेदन दे सकती है। पुलिस अधिकारियों को उसकी सुरक्षा को लेकर आवश्यक कदम उठाने होंगे।