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Indore: खुशियों के रंग में हादसे का कलंक क्यों लगा इंदौर के चेहरे पर ?

सार

आनंद और उल्लास के माहौल में बीते कुछ वर्षों से होने वाली इस तरह की घटनाएं सवाल खड़े कर रही है। एक तरफ तो इंदौर की गेर को यूनिस्को में शामिल करने के लिए अभियान चलाने की बात करते है, दूसरी तरफ यह घटनाएं इशारा करती है कि गेर में अभी भी कई कमियां है।
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गेर में युवक की मौत। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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अजनबी चेहरे एक दूसरे को देखते हैं, रंग लगाते हैं और मुस्कुरा कर आगे बढ़ जाते हैं। इतनी आत्मीयता, अपनापन और उत्सव किसी और शहर में कहां मिलता है, लेकिन इस विशुद्ध इंदौरीपन में कड़वाहट घुलने लगी है। इंदौर की रंगपंचमी को अब नजर लगने लगी है।

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इंदौर में गेर की 76 साल पुरानी परंपरा में कभी कोई हादसा नहीं हुआ। इस बार रंगों के इस पर्व में शहर के चेहरे पर हादसे का एक बदनुमा दाग लग गया, जो कभी नहीं मिटेगा। हादसा क्यों हुआ? कैसे हुआ? यह जांच चलती रहेगी, प्रकरण भी दर्ज होंगे, लेकिन अब पर्व में सुरक्षा भी जरूरी है। इधर से उधर जूते-चप्पल उछाले जाते हैं। आंखों में गुलाल फेंका जाता है। स्वच्छता में नंबर वन इस इंदौर को अब अपनेपन के इस त्योहार पर सभ्यता का परिचय भी देना होगा।

गेर आयोजक भी सुरक्षा का ध्यान नहीं रखते। हर बार पानी से भरे टैंकरों पर जरूरत से ज्यादा लोग चढ़े होते हैं। वाहन का ब्रेक लगता है तो उस पर खड़े युवक गिरते संभलते रहते हैं। बुधवार का हादसा भी ऐसे ही हुआ, लेकिन दुख की बात यह है कि इसमें एक जवान युवक की जान चली गई। तीन लोग बेहोश हो गए। गेर में शामिल महापौर की पत्नी और शहर की प्रथम महिला जूही भार्गव भी गेर में घायल हो गईं। उनकी आंखों में सूजन आ गई। पिछले साल भी किसी ने गेर में एक पत्थर उछाला था, जिससे एक युवक का सिर फूट गया था। कुछ सालों पहले एक कार के शीशे तोड़े गए। कार में दो महिलाएं सवार थीं।
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आनंद और उल्लास के माहौल में बीते कुछ वर्षों से होने वाली इस तरह की घटनाएं सवाल खड़े कर रही है। एक तरफ तो नेता और प्रशासन इंदौर की गेर को यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल करने के लिए अभियान चलाने की बात करते हैं और दूसरी तरफ ये घटनाएं इशारा करती हैं कि गेर में अभी भी कई कमियां हैं। जिन्हें दूर करने की जरूरत है। अब शहर की परंपरा युवा हाथों में जा रही है। गेर में युवक-युवतियों की भीड़ भी समान रूप से नजर आने लगी है।

पहले गेर को देखने और उसमें शामिल होने में महिलाओं की सहभागिता का प्रतिशत कम होता था, लेकिन अब ऐसा नहीं है, इसलिए अब भविष्य में इस उत्सव को परंपरा के साथ सुरक्षा की डोर में भी कस कर बांधना होगा। यह जिम्मेदारी सिर्फ पुलिस और प्रशासन की नहीं है। गेर में शामिल शहरवासियों को खुद को अनुशासन की कसौटी पर खरा उतरना होगा, तभी यह परंपरा निखर पाएगी।

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