इंदौर के समीप पीथमपुर में जलाए गए यूनियन कार्बाइड फैक्टरी के जहरीले कचरे को जलाने के बाद निकली राख का प्रदूषण नियंत्रण मंडल ने परीक्षण शुरू कर दिया है। वैज्ञानिकों ने कहा है कि जांच में राख में किसी तरह के पेस्टीसाइड हानिकारक तत्व नहीं पाए गए है, जो कैंसर का कारण बनते है। राख में हेवी मैटल्स की मात्रा भी सीमित पाई गई है।
भोपाल में साल 1984 की 2 दिसंबर की रात को पांच हजार से ज्यादा लोगों को मौत की नींद सुलाने वाली यूनियन कार्बाइड फैक्टरी का 337 टन कचरा चार माह में पीथमपुर के भस्मक में जला दिया गया है। अब उसकी 700 टन राख को लैंडफील किया जाएगा। कचरा जलाने के बाद बची इस राख में हानिकारक तत्व पाए जाने का अंदेशा पीथमपुर के रहवासी कर रहे थे।
इसे लेकर प्रदूषण नियंत्रण मंडल के अधिकारी मनोज कुमार मंडरई ने कहा कि पीथमपुर प्लांट में जलाए गये वेस्ट के बाद बची हुई राख में किसी भी रसायन का रिसाव भूमिगत जल की गुणवत्ता प्रभावित नहीं कर सकेगा। उसे वैज्ञानिक तरीके से लैंडफील किया जाएगा। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया है कि भविष्य में इससे कोई खतरा नहीं है और इसकी 30 वर्षों तक मॉनीटरिंग भी की जाएगी।
उन्होंने कहा कि राख में किसी भी प्रकार के पेस्टीसाइड व इनसेक्टीसाइड मौजूद नहीं पाए गए, जो कि कैंसर के मुख्य कारण होते हैं। इसमें हेवी मैटल्स की मात्रा भी बहुत सीमित पाई गयी। आपको बता दें कि पंद्रह साल पहले पीथमपुर से 40 टन कचरे को लाकर लैंडफील किया गया था। इसके बाद प्लांट के समीप की एक बावड़ी के पानी का रंग काला हो गया था। इसके अलावा फसल भी प्रभावित होने की बात किसानों ने कही थी। तब तत्कालीन केंद्रीय पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश भी पीथमपुर आए थे और अपने साथ पानी के सेंपल लेकर गए थे।