इंदौर के केन्द्रीय विद्यालय से सेवानिवृत 81 वर्षीय नंदनी चिपलूणकर साइबर ठगी का शिकार होते-होते बच गईं। उन्होंने डिजिटल अरेस्ट और साइबर ठगी के बारे में पहले से काफी कुछ सुन रखा था। जब उनके पास ठगों का काॅल आया तो बहुत डर गईं। ठगों ने मनोवैज्ञानिक तरीके से इस तरह का माहौल रचा कि वे जैसा बोल रहे थे, वैसा नंदनी करने के लिए तैयार होती चली गईं।
मुंबई में बैंक खाता होने की बात पर अचरज हुआ
नंदनी ने 'अमर उजाला' से चर्चा में बताया कि ठगों ने कहा कि आपका मुंबई के एक बैंक में खाता चल रहा है। मैंने कहा कि मेरा इंदौर के अलावा दूसरे किसी भी शहर के बैंक में कोई खाता नहीं है। नंदनी को ठगी की शंका न हो, इसलिए फिर ठगों ने बात संभालते हुए कहा कि आपके नाम का फर्जी खाता मनी लांड्रिंग के लिए खोला होगा। इसके बाद मुंबई के कोलावा के पुलिस अधिकारी बनकर एक ठग अंनत कुमार ने नंदनी से बात की। फिर रश्मि शुक्ला नाम बताकर एक महिला ठग ने खुद को अधिकारी बताया। इसने नंदनी से बात भी की। वह अंग्रेजी में बातें कर रही थी। 36 घंटे तक डिजिटल अरेस्ट रहने के बाद नंदनी 52 लाख की एफडी बैंक से तुड़वाने के लिए राजी हो गई थीं।
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नंदनी के नौकरी से सेवानिवृृत होने के बाद पीएफ का जो पैसा मिला था। उसकी उन्होंने एफडी कराई थी। ठग ने पुलिस अधिकारी बनकर पहले उनका अकाउंट नंबर मांगा था। फिर एक करोड़ रुपये की मांग की, लेकिन बाद में उन्होंने 52 लाख की एफडी तुड़वाने के लिए नंदनी को राजी कर लिया था। एफडी की राशि ठगों ने अपने खाते में डालने के लिए बोला था। जब वे बैंक में हैरान-परेशान होकर एफडी तुड़वाने पहुंची तो बैंक मैनेजर पुष्पांजलि कुमारी को शंका हुई। उन्होंने एडिशनल डीसीपी राजेश दंडोतिया को इसकी जानकारी दी। इसके बाद सायबर फ्राड का शिकार होने से रिटायर्ड प्रिंसिपल को बचा लिया गया।
इस तरह बचे डिजिलट अरेस्ट से