इंदौर के गोपाल मंदिर को शादी के लिए किराए पर देने का मामला चर्चा में है। इस मामले में संभागायुक्त दीपक सिंह ने माफी अफसर विनोद राठौर और मंदिर मैनेजर कौशल को हटा दिया। प्राचीन गोपाल मंदिर संभागायुक्त कार्यालय के अधीन आता है। कार्यालय में तहसीलदार स्तर के अधिकारी को संभाग के सरकारी मंदिरों की देखरेख की जिम्मेदारी दी जाती है। जिसे माफी अफसर भी कहा जाता है। आखिर यह नाम क्यों पड़ा। इसे लेकर अमर उजाला ने पड़ताल की।
इंदौर संभाग में 100 से ज्यादा मंदिर है। जिनके पास सैकड़ों एकड़ जमीनें है। मंदिर की संपत्ति का रिकार्ड संभागायुक्त कार्यालय में रखा जाता है और मंदिर से जुड़ी समिति हो या ट्रस्ट। कोई भी बड़ा फैसला लेने से पहले कार्यालय से अनुमति लेना होती है। इंदौर के बांके बिहारी मंदिर, दुर्गा मंदिर, यशोदा मंदिर, गोपाल मंदिर भी संभागायुक्त कार्यालय के अधीन है। मंदिरों के रिकार्ड की जानकारी संभागायुक्त के अधीन रहने वाले माफी अधिकारी के पास रहती है।
ग्रामीण क्षेत्रों में कई मंदिरों की जमीन कोटवार या पुजारी को देखरेख के लिए दी जाती है। वे जमीन में फसल बोते है और बदले में मंदिर की देखरेख भी करते है। जमीन को लेकर किसी तरह का राजस्व व टैक्स उनके लिए माफ रहता है। इस कारण बोल-चाल की भाषा में कोटवार या पुजारी मंदिर का रिकार्ड रखने वाले अधिकारी को माफी अफसर कहते थे।
तब से यह नाम प्रचलित है और अभी भी यह उपयोग में लाया जाता है। सरकारी पत्राचार में भी इसका उल्लेख किया जाता है। सेवानिवृत अपर कलेक्टर रजनीश श्रीवास्तव बताते है कि यह बोलचाल का नाम है, जो वर्षों से उपयोग में लाया जा रहा है।