नवरात्रि मां की आराधना और उपासना का पावन पर्व है। देशभर में माता के मंदिरों में श्रद्धालु पूजा-पाठ कर रहे हैं। इस विशेष अवसर पर आपको आज बता रहे हैं देवी अन्नपूर्णा धाम की महिमा और उनसे जुड़ी हुई कहानियां। गौरतलब है कि इंदौर के प्राचीन शक्ति स्थलों में बिजासन के बाद अन्नपूर्णा मंदिर का स्थान आता है। देवी अन्नपूर्णा सबका पालन पोषण करने वाली मां और शक्ति पूर्णा हैं। यह इंदौर की जनता का प्रमुख आस्था स्थल है। यहां नवरात्र के अलावा सामान्य दिनों में भी भक्त दर्शन के लिए आते हैं।
अन्नपूर्णा मंदिर और आश्रम के संस्थापक ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी प्रभानंद गिरि जी महाराज थे। करीब दो एकड़ क्षेत्र में मंदिर परिसर स्थित है। पर्यटन की दृष्टि से नगर में आने वाले श्रद्धालु माता अन्नपूर्णा मंदिर के दर्शन के लिए जरूर आते हैं। करीब दो वर्ष पूर्व हुए इस मंदिर के जीर्णोद्धार के बाद यह आकर्षण का केंद्र बन गया है। शारदीय नवरात्र में दर्शनार्थी बड़ी संख्या में यहां दर्शन करने आते हैं और देवी मां से अपनी मान्यता पूर्ण होने की कामना करते हैं।
1955 में पेड़ के नीचे आराधना करते थे प्रभानंद जी
मंदिर के इतिहास की बात करें तो वर्ष 1955 में स्वामी प्रभानंद जी अन्नपूर्णा मंदिर के समीप ही पेड़ के नीचे बैठ कर पूजा-पाठ और आराधना में तल्लीन रहते थे। अन्नपूर्णा मंदिर शहर के हृदय स्थल राजवाड़ा से करीब पांच किलोमीटर दूर दक्षिण पश्चिमी दिशा में स्थित है। 75 साल पहले यह पूरा इलाका निर्जन और खेती बाड़ी और जंगल का था। नगर के नागरिकों के संपर्क में आने के बाद 1959 में महामंडलेश्वर स्वामी प्रभानंद गिरि जी महाराज ने जनसहयोग से इस मंदिर का निर्माण करवाया। स्वामी प्रभानंद जी गिरि का जन्म 1911 में मकर संक्रांति पर आंध्र प्रदेश में हुआ था। उनका अवसान भी मकर संक्रांति को 1990 में हुआ। मंदिर के प्रवेश द्वार पर विशाल हाथी 1975 में निर्मित किए गए थे। यह दक्षिण भारत के मंदिर की शैली पर आधारित है।
कौन हैं देवी अन्नपूर्णा, क्या है मान्यता
भारतीय संस्कृति में कृषि को भी धन कहा गया है और हम अन्न को भी देवता स्वरूप यानी अन्न देवता मानते हैं। इसी तरह मां पार्वती को अन्न की देवी यानि अन्नपूर्णा माना गया है। ऐसी मान्यता है कि जो भक्त अन्नपूर्णा मंदिर में दर्शन के लिए आता है, उसका भंडार धन-धान्य और अनाज से भरा रहता है, क्योंकि देवी अन्नपूर्णा स्वयं ही अन्न की देवी हैं।
40 साल से आ रहे दर्शन करने
अन्नपूर्णा मंदिर में आने वाले कई भक्त वर्षों से नियमित रूप से आते हैं। महू के राजेंद्र हर्षवाल का कहना है कि मैं 40 वर्ष से अन्नपूर्णा मंदिर प्रतिदिन आता हूं। मेरा एक्सीडेंट हो गया था, वह विकट समय था। मेरे पर मां अन्नपूर्णा का आशीर्वाद और कृपा रही कि मैं विकट परिस्थियों में स्वस्थ हो गया। ऐसे कई भक्त हैं जो अपना दैनिक कार्य आरंभ करने से पूर्व नित्य देवी के दर्शन करते हैं।
2023 में हुआ अन्नपूर्णा मंदिर का जीर्णोद्धार
अन्नपूर्णा मंदिर के महामंडलेश्वर स्वामी विश्वेश्वरानंद गिरि महाराज के सानिध्य में 2023 में इसका जीर्णोद्धार कार्य हुआ। इस पर करीब 20 करोड़ की लागत आई। मंदिर की लंबाई 108 फीट और चौड़ाई 54 फीट है। नवनिर्मित मंदिर परिसर में भगवान शिव को देवी पार्वती द्वारा भिक्षा देते हुए दर्शाया गया है। निर्मित मंदिर में मकराना मार्बल का उपयोग किया गया है। इसमें लोहे का उपयोग नहीं किया गया है। मंदिर के मुख्य मंडप में नवदुर्गा, 10 महाविद्या और 64 योग योगिनी की मूर्तियां पत्थर पर उकेरी हैं। नवनिर्मित मंदिर द्रविड़ शैली और दक्षिण के मंदिरों के साथ नागर शैली का मिश्रित उदाहरण है।
कलश की ऊंचाई 81 फीट
जीर्णोद्धार के बाद मंदिर का लोकार्पण 3 फरवरी 2023 को किया गया था। पूर्ववर्ती मंदिर से मां अन्नपूर्णा, मां कालका और मां सरस्वती की मूर्तियों को नवीन मंदिर में स्थापित किया गया। मंदिर परिसर में भगवान शिव, काल भैरव देव और हनुमान जी की प्रतिमाएं भी विभिन्न नवीन मंदिरों में स्थापित की गई हैं। मंदिर परिसर में काल भैरव का मंदिर भी है। मुख्य मंदिर के कलश की ऊंचाई 81 फीट है।
ट्रस्ट करता है मंदिर, आश्रम, विद्यालय का संचालन
अन्नपूर्ण मंदिर ट्रस्ट ओंकारेश्वर और नासिक में भी मंदिर का संचालन करता है। इंदौर के मंदिर में कई जनहित के कार्य भी जारी हैं जैसे देवी अन्नपूर्णा विद्यालय। वेद पाठशाला, मां अन्नपूर्णा छात्रावास, संत निवास, वैदिक छात्रावास, गौशाला, अन्न क्षेत्र और होम्योपैथी चिकित्सालय प्रमुख हैं। इनका लाभ कई लोग उठाते हैं।
दिन में तीन बार श्रृंगार
मंदिर में विराजमान तीन देवियों का दिन में तीन बार श्रृंगार होता है। यह परंपरा करीब चार दशक से जारी है। कई भक्त श्रृंगार सामग्री भेट कर अपनी और से श्रृंगार करवाते हैं, वर्तमान में करीब 300 से अधिक भक्तों की बुकिंग है।
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लक्ष्य चंडी यज्ञ से लेकर अनेक कथाएं हुईं
मंदिर परिसर में 1968 में लक्ष्य चंडी यज्ञ के बाद संत मुरारी बापू और संत रमेश भाई ओझा, संत रामचंद्र डोंगरे महाराज की कथा के आयोजन हो चुके हैं। विशेष दिनों में मंदिर में अनुष्ठान और हवन होते रहते हैं। नवरात्र में देवी पूजा के विशेष आयोजन होते हैं।
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