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Indore News: बैंक की नौकरी छोड़ कर पुणे की अनुराधा कश्मीर घाटी में जगा रही देशभक्ति का अलख

Wed, 01 Jul 2026 08:41 PM IST
Abhishek Chendke न्यूज डेस्क, अमर उजाला, इंदौर

सार

पुणे की अनुराधा प्रभु देसाई पिछले 22 वर्षों से कश्मीर घाटी और कारगिल में देशभक्ति का संदेश फैलाने का काम कर रही हैं। सेना के शौर्य और बलिदान की गाथा जन-जन तक पहुंचाने के लिए उन्होंने बैंक की नौकरी छोड़ दी।
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अनुराधा प्रभु देसाई - फोटो : amar ujala
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विस्तार
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एक कार्यक्रम में शामिल होने के लिए इंदौर आईं पुणे की अनुराधा प्रभु देसाई कश्मीर घाटी में देशभक्ति का अलख जगा रही हैं और साथ ही सेना की शौर्यगाथा सुनाने के लिए देश के दूसरे हिस्सों में भी जाती हैं। अनुराधा ने बताया कि वे वर्ष 2004 में एक पर्यटक के तौर पर द्रास और कारगिल गई थीं, लेकिन वहां उन्होंने सेना के पराक्रम के बारे में सुना तो उन्हें लगा कि वे सेना में तो नहीं जा सकतीं, लेकिन उन्हें भी देश के लिए कुछ करना चाहिए।

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वे पिछले 22 वर्षों में 35 से ज्यादा बार द्रास, कारगिल और कश्मीर घाटी जा चुकी हैं और वहां के बारे में किताबें भी लिख चुकी हैं। अनुराधा ने फैसला लिया कि वे सेना से जुड़े प्रसंग सुनाया करेंगी। वे बैंक में मैनेजर थीं, लेकिन अपनी देशभक्ति के लिए उन्होंने नौकरी छोड़ दी।

पहले उनके आयोजन स्कूल, कॉलेज व कुछ संस्थानों तक सीमित रहे, लेकिन जब उनके प्रयास सराहे जाने लगे तो उन्हें इसके लिए बुलाया जाने लगा और इसके लिए उन्हें पारिश्रमिक भी मिलने लगा। अनुराधा उन पैसों का इस्तेमाल सैनिकों की मदद करने और उनके साथ त्योहार मनाने में करती हैं।

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अनुराधा बताती हैं कि सेना की नौकरी कोई जॉब नहीं है। सीमा पर खड़ा सैनिक यह जानता है कि वह या तो तिरंगा फहरा कर आएगा या तिरंगे में लिपटकर। वह हमारी रक्षा के लिए अपनी जान की बाजी लगाता है। अनुराधा ने फिल्म लक्ष्य से प्रेरित होकर लक्ष्य फाउंडेशन बनाई।

वे कश्मीर के उन इलाकों में भी जाती हैं, जहां कभी भी हालात बिगड़ सकते हैं। वहां के स्कूलों में जाकर वे कश्मीरी बच्चों के साथ मेरा देश, मेरी पहचान अभियान के तहत कार्यक्रम करती हैं। फूड फेस्टिवल के जरिए उन्हें राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र के व्यंजनों से परिचित कराया जाता है, ताकि वे दूसरे प्रदेशों से जुड़े रहें। वहीं, दूसरे राज्यों के लोकनृत्यों और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के जरिए भी देशभक्ति की भावना को बढ़ावा दिया जाता है।
 

अनुराधा बताती हैं कि कई बार इस तरह के कार्यक्रमों में उन्हें विरोध का सामना भी करना पड़ा। कुछ लोग विरोध करने आ जाते थे, लेकिन वे डरे बिना घाटी में इस तरह के आयोजन करती रहीं और देशभक्ति का भाव जगाती रहीं।

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