प्रख्यात अंग्रेज अधिकारी सर जॉन मालकम ने देवी अहिल्याबाई को श्रेष्ठ और कुशल प्रशासिका, दानवीर कहा था। किसी अंग्रेज अधिकारी द्वारा देवी के व्यक्तित्व को लेकर कही विरली टिप्पणी है। चूंकि अहिल्या बाई के कार्यकाल के वक्त देश में अंग्रेजी राज्य का आधिपत्य था। अहिल्याबाई के पूर्व और बाद में प्रदेश में कई वीर महिलाएं रियासतों में प्रमुख की भूमिका में रहीं, परंतु इनमें कुछ ही नाम ऐसे हैं जो आज स्मरण किए जाते हैं। उनमें प्रमुख वीर रानी दुर्गावती का नाम शामिल है। रानी दुर्गावती अपने जीवन में मात्र 39 वर्ष 8 माह 19 दिन जीवित रहीं। छोटे से अल्पकाल में उन्होंने अपने जीवन में वीरता के कई झंडे गाड़े। रानी की वीरता का एक प्रमाण यह है कि उन्होंने 52 युद्धों का सामना किया और उनमें से 51 युद्ध में विजय प्राप्त की। दुर्गावती की 501वीं पुण्यतिथि पर उनकी बहादुरी और उनके परोपकारी कार्य को आज भी स्मरण किया जाता है।
गढ़ मंडला राज्य के राजशाही इतिहास में अनेक राजाओं की प्रशासनिक व्यवस्था रही, परंतु गोंडवाना राज्य में दलपत सिंह की अर्धांगिनी रानी दुर्गावती का शासन काल उनके निधन के 461 वर्ष व्यतीत होने के बाद भी याद किया जाता है।
जन्म और आरम्भिक जीवन
5 अक्तूबर 1524 को रानी दुर्गावती का जन्म दुर्गाअष्टमी के दिन होने की कारण उनका नाम दुर्गावती रखा गया। उनके पिता का संबंध चंदेल राजवंश से था। 1542 में उनका विवाह गोंड राजा संग्राम सिंह के पुत्र दलपत राय के साथ हुआ। उस वक्त गोंड और राजपूत परिवार का यह संबंध विरला उदाहरण था। राजा संग्राम सिंह का बहुत विशाल राज्य था, उनके राज्य में 52 गढ़ थे। 1945 में रानी दुर्गावती को एक पुत्र हुआ, जिसका नाम वीर नारायण रखा गया। 1550 में पति दलपत शाह की मृत्यु हो गई। उस वक्त उनके बेटे की आयु पांच वर्ष ही थी। पुत्र वीर नारायण बहुत ही छोटे थे, इसलिए गोंडवाना राज्य की बागडोर दुर्गावती ने अपने हाथों में ले ली। मंत्रियों की मदद से सफलतापूर्वक राजपाठ संचालित किया।
राज्य सीमा
रानी दुर्गावती का राज्य 52 गढ़ों में था। इसमें सिवनी, पन्ना, छिंदवाड़ा, भोपाल, होशंगाबाद, बिलासपुर, डिंडोरी, मंडला, नरसिंहपुर, कटनी और नागपुर शुमार थे। एक अनुमान के अनुसार उत्तर से दक्षिण 300 मील एवं पूर्व से पश्चिम 225 मील इस तरह 67500 वर्ग मील क्षेत्र में उनके राज्य का आधिपत्य था।
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राज्य की आर्थिक संपन्नता और लोक कार्य
रानी दुर्गावती ने अपने 15 वर्ष के शासन में कई लोकहित के कार्य किए। उनके राज्य में प्रजा खुश थी। उन्होंने अपने कार्यकाल में कई मंदिर, इमारतें, जलाशयों को निर्मित करवाया। उनमें प्रमुख जबलपुर का रानी ताल जो रानी दुर्गावती ने अपने नाम पर बनवाया। रानी की दासी के नाम पर चेरी लाल और दीवान आधार सिंह के नाम पर आधार ताल बनवाया। इससे जाहिर होता है कि रानी की नजर में सब एक समान थे। रानी एक योग्य और बहादुर शासिका थीं। रानी ने सुरक्षा के लिए कई किले बनवाए और उनके पुराने की मरम्मत करवाई। रानी के पास 23000 कृषि प्रधान गांव की देखरेख की जिम्मेदारी थी। रानी के राज्य में सोने के सिक्के चलते थे। राज्य इतना समृद्धि शील था कि जमीन का लगान स्वर्ण मुद्राओं में चुकाया करते थे। प्रजा के दुख-दर्द रानी स्वयं सुना करती थीं। साथ ही वे कुशल योद्धा और युद्ध कला में निपुण थीं।
मुसीबतों का सामना
रानी दुर्गावती राज्य की कमान संभालने के बाद कई संकटों का सामना किया। मालवा-मांडव के सुल्तान बाजबहादुर से लेकर अकबर तक मुगलों के अनेक बड़े आक्रमणों का रानी ने बहादुरी से जवाब दिया और अपनी प्रजा के साथ राज्य को सुरक्षित रखा। गोंडवाना राज्य की सीमा मालवा तक थी, रानी की ख्याति दूर-दूर तक फैल चुकी थी। 1556 में बाज बहादुर ने रानी दुर्गावती पर आक्रमण कर दिया। रानी की सेना बड़ी बहादुरी से लड़ी और बाज बहादुर को इस युद्ध में पराजय का सामना करना पड़ा।
आखिरी युद्ध में हारीं, खुद ही ली अपनी जान
अकबर की सेना को कड़ी टक्कर दी
अकबर के सेनापति आसफ खान ने गोंडवाना पर आक्रमण कर दिया। भौगोलिक परिस्थितियों के कारण रानी दुर्गावती की सेना ने अकबर की सेना को कड़ी टक्कर दी। इस युद्ध में रानी ने पुरुष वेष धारण कर युद्ध का नेतृत्व किया और अकबर की सेना को संध्या होते होते खदेड़ दिया, इस तरह रानी की विजय हुई। पराजय से मुगल सेना के सेनापति आसफ खान ने विशाल सेना एकत्र की और तोपखाने की मदद से हमला बोला। इस युद्ध में रानी को पराजय का सामना करना पड़ा। रानी को घायल देख सेना के वरिष्ठ लोगों ने सलाह दी कि आप सुरक्षित स्थान पर चले जाएं, पर रानी ने यह बात मानने से मना कर दिया और शत्रु के हाथों प्राण देने की बजाय अपनी स्वयं की तलवार से स्वयं का बलिदान दे दिया। रानी दुर्गावती के इस बलिदान का दिन 24 जून 1564 था, इसलिए प्रतिवर्ष 24 जून को बलिदान दिवस शौर्य दिवस के रूप में मनाया जाता है। रानी ने जीवन काल में लड़े बावन युद्धों में इस अंतिम युद्ध में पराजय का सामना किया और अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली।
बलिदान दिवस पर डाक टिकट जारी हुआ
रानी दुर्गावती के सम्मान में 1983 में जबलपुर विश्वविद्यालय का नाम रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय कर दिया गया। 1988 में उनके बलिदान दिवस पर भारतीय विभाग ने डाक टिकट जारी किया। कई विद्यालय और सरकारी भवनों का नामकरण रानी के नाम पर किया गया। प्रसिद्ध उपन्यासकार वृंदावन लाल वर्मा ने रानी के व्यक्तित्व को अवतार के रूप में रखा। अलग-अलग कालखंड के इतिहासकारों ने रानी दुर्गावती का गुणगान किया है।