इंदौर की पहचान सफाई के साथ स्वाद की राजधानी के लिए भी होती है। यहां की सराफा चौपाटी का स्वाद देश दुनिया में प्रसिद्ध है, लेकिन इन दिनों सराफा चौपाटी स्वाद के लिए नहीं बल्कि विवाद के लिए चर्चा में है। जरुरत से ज्यादा हो चुकी दुकानों को नगर निगम ने हटाया है। कभी यहां दो सौ से ज्यादा दुकानें लगती थी और स्वाद की दुनिया सजती थी, लेकिन अब सराफा चौपाटी 69 दुकानों में सीमित हो गई है।
यह बात भी सही है कि सराफा चौपाटी खान पान की ज्यादा वैरायटी के बजाए खाने के स्वाद अौर गुणवत्ता के कारण पहचानी जाती है। जिसे लौटाने का प्रयास हो रहा है। इस सराफा चौपाटी ने इतिहास से अब तक स्वाद की परंपरा का लंबा सफर तय किया है।
सराफा राजवाड़े के सबसे समीप था।व्यापार -व्यवसाय का केंद्र था। बुलियन मार्केट और स्टॉक एक्सचेंज भी यही स्थित था। शहर के नामी मारवाड़ी व्यापारियों की दुकाने भी यही थी।अफीम के कारोबार के लिए किसी समय पहचाना जाने वाले इस बाजार में एक समय सोने चांदी ,कपडा ,साबुन ,बिजली के सामान ,सब्जी पूरी की दुकानें ,पोस्ट ऑफिस आदि हुआ करते थे।
बाजार का विस्तार हुआ और सिर्फ स्वर्ण व्यवसाय ही सराफा में रह गया। समीप की मोरसली गली जो भोजनालय के लिए अपनी पहचान रखती थी ,यहाँ के भोजनालय और सब्जी -पूड़ी की दुकानों के साथ मुंग का हलवा प्रसिद्ध हुआ करता था। धीरे -धीरे इस क्षेत्र की दुकाने सराफा में शिफ्ट हुई और जति ,भारत माता ,शर्मा स्वीट ,ब्रजबासी मिठाई भंडार ने सराफा को अलग पहचान दी।
सराफा,बजाज खाना ,एमटी क्लॉथ मार्किट में खरीदी करने के लिए प्रदेश भर से व्यापारी आया करते थे और इन्ही क्षेत्रो में लाज में रखा विश्राम करते थे। सराफा क्षेत्र में बड़े थालों में कलाकंद ,रबड़ी ,बर्फी सिर पर रख फेरी वाले घुमा करते थे। रात में ये ही मिठाई विक्रेता सराफा के ओटलों पर मिठाई बेचा करते थे ,बस यही से शुरुआत हुई चाट -चौपाटी की।
विवाद की वजह क्या रही
फरवरी 2024 में हरदा में फटाका फैक्ट्री में विस्फोट के बाद सराफा चाट चौपाटी की सुरक्षा को लेकर नगर निगम को चिंता हुई और एक समिति का गठन कर जांच कराई गई। इसमें यह निष्कर्ष निकला कि सराफा चौपाटी बारूद के ढेर पर बैठी है, क्योंकि यह चौपाटी खुले में लगती है और यहां संकरी गलियों में गैस भट्टियों इस्तेमाल होता है। सराफा की कई चाट की दुकानों में फुटपाथ पर ही सामग्री तत्काल निर्मित की जाती है। सराफा में सोना-चांदी का कार्य होता है और उसमें तेजाब की जरूरत रहती है, आभूषणों के निर्माण में गैस का उपयोग होता है, संकरी गलियां के कारण फायर ब्रिगेड के वाहनों को पहुंचने में कई तकलीफों को देखते हुए चौपाटी की सुरक्षा प्रमुख मुद्दा बन गया है।
सराफा कारोबार हो रहा प्रभावित
सराफा व्यापारियों का यह भी कहना है कि रात में चौपाटी लगाने वाले दुकानदार शाम होने के पूर्व ही आ जाते हैं और उनकी जेवर की दुकानों के आगे दुकानें लगाते हैं और रोकने पर विवाद करते हैं। परंपरागत खाद्य पदार्थों की दुकानों को ही चौपाटी पर लगने देने और शेष दुकानों को अन्यत्र शिफ्ट करने की मांग जोर पकड़ी। वहीं, कुछ सराफा व्यापारी चाहते हैं कि चाट चौपाटी की दुकानें लगे तो सभी लगें, नहीं तो एक भी नहीं रहना चाहिए। हाल ही में यहां रात के समय नशे में लोगों के आने और विवाद करने के भी मामले सामने आए हैं।
सराफा चौपाटी की शुरुआत कैसे हुई
सराफा में खानपान की शुरुआत की रोचक कहानी है। यहां 1877 में दी बड़ा सराफा कॉटन एसोसिएशन की स्थापना हुई थी। इस संस्था का स्वयं का भवन था। इसके बाद श्री इंदौर बुलियन एक्सचेंज की स्थापना 1944 में हुई थी। कारोबार के लिए बड़ी संख्या में व्यापारी एकत्र होते थे। उस दौर में मारवाड़ से आए व्यापारियों की दुकानें सराफा में थी। जहां सोना, चांदी, कपड़ा, अफीम के कारोबार के सौदे हुआ करते थे। इन्हीं भवनों और दुकानों के बाहर और सराफा क्षेत्र में पीतल के बड़े थालों में कलाकंद और अन्य मिठाई घरों से निर्मित कर कुछ राजस्थान से आए मिठाई बनाने वाले कारीगर लाकर बेचते थे। सराफे के समीप ही स्थित मोरसली गली में मुख्य रूप से ये सामग्री बेची जाती थी। मोरसली गली भोजन की दुकानों के लिए प्रसिद्ध रही।
जति हलवाई की दुकान प्रसिद्ध थी
जति जी और जैन मिठाई भंडार की सब्जी पुड़ी की दुकानों के साथ अन्य भोजन की दुकानें इस गली में थीं। सराफे में बाद में राजहंस, नीलकमल जैसे भोजनालय भी आरंभ हुए थे। मोरसली गली में स्थान की कमी के कारण धीरे धीरे सराफा बाजार में भारत माता, जैन पूड़ी भंडार, ब्रजवासी, शर्मा स्वीट, सर्व फलाहारी नागौरी मिठाई, जय जिनेंद्र नमकीन भंडार की दुकानें 1940 के बाद आरंभ हुईं। उस दौर में बिजली नहीं होना और सामाजिक परंपरा के कारण सूर्यास्त के साथ ही दुकानें बंद हो जाती थीं। दुकान बंद होने के बाद व्यापारी ओटलों पर बैठ कर बातचीत करते थे। ऐसे दौर में राजस्थान से आए कुछ मिठाई के कारीगरों ने मिठाई की दुकानें यहां लैंपों की रोशनी में लगाना आरंभ की थी। सराफे में 1950 के दशक के बाद दूध, साबुन, बिजली, कपडे की दुकानों के साथ लॉज, पोस्टऑफिस भी थे पर समय के साथ ये विलुप्त हो गए।
ये हैं सराफा की परंपरागत मिठाइयां
अब यह मांग की जा रही है कि परंपरागत मिठाई की दुकानें ही सराफा में रहने दी जाएं, ऐसे में जानना जरूरी है कि आखिर वे कौन सी मिठाइयां हैं, जो प्राचीन दौर में सराफे में उपलब्ध होती थीं? सराफे और मोरसली गली में मिठाई की दुकानों पर मावे की बर्फी, मक्खन बड़े, घेवर, फैनी, मावा मिश्री के लड्डू और बेसन के लड्डू मुख्य रूप से मिलते थे। बाद में कलाकंद, रबड़ी, भुट्टे का किस, छोले टिकिया और मौसम के अनुसार गाजर का हलवा, मूंग का हलवा, तले हुए गराडू और शुद्ध घी की बड़ी जलेबी, केसरिया दूध मिलना आरंभ हुआ था। डिब्बे का आइसक्रीम गर्मी में 1950 के करीब मिलना शुरू हुआ था। गर्मी में आइसक्रीम मिलने की मुख्य वजह नगर में एसपी एंड कंपनी का पक्का बर्फ सरलता से मिलना था। वर्तमान में सराफा चाट चौपाटी पर कई दुकानें लगती हैं, जिनका मालवा के मूल व्यंजनों के कोई वास्ता नहीं है।
धानगली,शक्कर बाजार ,मोरसली गली के निवासियों का कहना है कि मोरसली गली भोजन के लिए पहचानी जाती थी जिसमे अब कोई दुकान नहीं रही और विवाद सराफा चाट चोपटी को हो गया। संजय भाटी का परिवार शक्कर बाजार में पिछले डेढ़ सौ वर्ष से रहता है उनका कहना है की दादाजी सराफा से मिठाई लाया करते थे ,घर पास में ही था तब सराफा में बीस -पच्चीस दुकानें लगा करती थी,कुछ ठेले और ओटलो पर दुकानें मैने देखी है।