राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने 100 वर्षों के सफर में कई बदलाव देखे हैं। शुरुआत में महाराष्ट्र तक सीमित शाखाओं और हिंदू विचारों के प्रसार पर केंद्रित संघ ने समय के साथ सेवा, शिक्षा, स्वास्थ्य और ग्रामीण विकास जैसे क्षेत्रों में भी अपनी गतिविधियों का विस्तार किया।
आपदा के समय स्वयंसेवकों के सेवा कार्यों से लेकर गणवेश और संगठनात्मक ढांचे में बदलाव तक, संघ की कार्यशैली में कई परिवर्तन हुए हैं। अब शताब्दी वर्ष के समापन के मौके पर संघ ने समाज के विभिन्न वर्गों तक अपनी पहुंच और गहरी करने की रणनीति तैयार की है। इसके तहत शाखाओं की संख्या बढ़ाने के साथ ही सामाजिक संगठनों के साथ सहभागिता बढ़ाने पर जोर दिया जाएगा।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के गठन के 100 वर्ष पूरे हो चुके हैं। हाल ही में शताब्दी वर्ष के समापन के अवसर पर इंदौर में स्वयंसेवकों का एकत्रीकरण आयोजित किया गया, जिसमें वक्ताओं ने संघ की आगामी रणनीति भी साझा की। इंदौर में ही संघ की अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल की बैठक भी हुई। फिलहाल संघ के कई बड़े पदाधिकारी इंदौर में ही प्रवास पर हैं।
इन 100 वर्षों में आरएसएस में कई बदलाव हुए, लेकिन वे व्यापक रूप से चर्चा में नहीं आ पाए। संघ के शुरुआती दौर में महाराष्ट्र में शाखाएं लगाने और हिंदू विचारों को आगे बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित किया गया था, लेकिन समय के साथ संगठन की गतिविधियों का दायरा बढ़ता गया। आपदा के समय स्वयंसेवकों ने सेवा कार्यों के माध्यम से संगठन की सामाजिक भूमिका को मजबूत किया। संघ ने अपने गणवेश में भी कई बदलाव किए।
आरएसएस की स्थापना वर्ष 1925 में विजयादशमी के दिन महाराष्ट्र के नागपुर में हुई थी। 100 वर्षों के सफर में संघ ने कई उतार-चढ़ाव भी देखे हैं। महात्मा गांधी की हत्या के बाद संघ पर देश में प्रतिबंध लगाया गया। कांग्रेस नेताओं ने संघ से जुड़े पदाधिकारियों पर भगवा आतंकवाद को बढ़ावा देने के आरोप भी लगाए। इन 100 वर्षों में वैचारिक तौर पर संघ की मूल दिशा में बड़े बदलाव नहीं हुए, लेकिन राजनीतिक प्रभाव, सामाजिक भूमिका और कार्यशैली में परिवर्तन जरूर देखने को मिले हैं।
अब संघ समाज के विभिन्न वर्गों के बीच अपनी पैठ और गहरी करना चाहता है। इसके लिए संघ अपने अनुषांगिक संगठनों की संख्या बढ़ाने के साथ ही सामाजिक संगठनों के साथ भी सहभागिता करेगा। आरएसएस के राष्ट्रीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर का कहना है कि संघ समाज के विभिन्न वर्गों को अपने साथ जोड़ेगा। इसके अलावा शाखाओं की संख्या भी बढ़ाई जाएगी, ताकि अधिक से अधिक लोग संघ के विचारों को जान सकें। अब संघ शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास और सामाजिक समरसता से जुड़े कार्यों पर भी अधिक ध्यान दे रहा है। इंदौर में ही संघ ने माधव सेवा न्यास के माध्यम से लोगों को चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराई हैं।
बीते दशक में बढ़ा विचारधारा से जुड़े दलों का राजनीतिक प्रभाव
आरएसएस खुद को सामाजिक संगठन मानता है और प्रत्यक्ष रूप से चुनावी राजनीति से दूर रखता है, लेकिन उसकी विचारधारा से जुड़े राजनीतिक दलों के सत्ता में आने से संघ का प्रभाव भी बढ़ा है। केंद्र में पिछले 12 वर्षों से भाजपा की सरकार है। इस दौरान अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण हुआ और जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाया गया। ये दोनों ही मुद्दे RSS के प्रमुख एजेंडे में शामिल रहे हैं।
गणवेश में बदलाव
आरएसएस का पारंपरिक गणवेश सफेद शर्ट, काली टोपी, खाकी निकर और चमड़े के बेल्ट से मिलकर बना था। हालांकि, 2016 में खाकी निकर की जगह भूरे रंग की फुल पैंट को गणवेश में शामिल किया गया। इसके साथ ही चमड़े के बेल्ट की अनिवार्यता भी समाप्त कर दी गई। अब स्वयंसेवक बदले हुए गणवेश में शाखाओं और अन्य आयोजनों में शामिल होते हैं।
प्रांत व्यवस्था खत्म, अब 88 संभागों में होगा काम
हाल ही में इंदौर में हुई बैठक में संघ की संगठनात्मक व्यवस्था में बदलाव पर सहमति बनी है। इसके तहत प्रांत व्यवस्था के स्थान पर संभाग व्यवस्था लागू करने का निर्णय लिया गया है। देशभर में आरएसएस के 46 प्रांत थे, लेकिन अब संगठन 88 संभागों के माध्यम से अपना काम करेगा। नई व्यवस्था के अनुसार संघ में पदों और संगठनात्मक जिम्मेदारियों का निर्धारण भी किया जाएगा।