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जिजीविषा: समवाय की सामाजिक और राजनीतिक अभिव्यक्ति का प्रतिनिधित्व करता है गणतंत्र दिवस, एकता का भी प्रतीक

Sun, 26 Jan 2025 04:33 PM IST
अनन्या मिश्रा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, इंदौर

सार

जिजीविषा: गणतंत्र दिवस समवाय की सामाजिक और राजनीतिक अभिव्यक्ति का प्रतिनिधित्व करता है। संविधान और भारत के नागरिकों के बीच का संबंध एक अविभाज्य संबंध है, जो परस्पर निर्भरता में निहित है। 
 
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जिजीविषा - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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भारत अपने संविधान और लोकतांत्रिक पहचान का उत्सव मना रहा है। किन्तु यह न केवल हमारे सामूहिक इतिहास पर बल्कि हमारे विविधतापूर्ण राष्ट्र को बनाए रखने वाले अंतर्संबंध पर भी विचार करने का क्षण है। 142.86 करोड़ भारतीयों का यह राष्ट्र, जिसमें सैकड़ों भाषाएं बोली जाती हैं, जिसमें कई पंथों का पालन करने वाले निवासी हैं और अनगिनत सांस्कृतिक परंपराओं को जीवंत रखने वाले समूह यह एक ही लोकतांत्रिक ढांचे के तहत कैसे पनप सकता है? इसका उत्तर एक प्राचीन भारतीय अवधारणा, ‘समवाय’ में निहित है।

भारतीय दर्शन के छह भागों में से एक, वैशेषिक दर्शन से उत्पन्न, समवाय दो संस्थाओं के बीच अविभाज्य संबंध या अंतर्निहित संबंध को संदर्भित करता है जो एक दूसरे से स्वतंत्र रूप से अस्तित्व में नहीं रह सकते हैं।

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यह एक प्रकार से आध्यात्मिक गोंद है जो अस्तित्व के घटकों को सुसंगत रूप से एक दूसरे से जोड़ता है। समवाय केवल एक दार्शनिक अमूर्तता नहीं है; यह वह सिद्धांत है जो हमारे आंतरिक और बाहरी दुनिया को जीवंत करता है, और जो एकता और अन्योन्याश्रितता संतुलन, सद्भाव और प्रगति की कुंजी हैं। 

समवाय का श्रेय ऋषि कणाद को दिया जाता है। इसे किसी पदार्थ या तत्व और उसके गुणों, कारण और प्रभाव, या पूरे और भाग जैसी संस्थाओं के बीच स्थायी, अविभाज्य संबंध के रूप में परिभाषित किया गया है।

उदाहरण के लिए, एक बर्तन मिट्टी (पदार्थ) और उसके रूप का एक अविभाज्य मिलन है। समवाय के बिना, यह संबंध विघटित हो जाता है और वस्तु का अस्तित्व समाप्त हो जाता है। एक वृहद स्तर पर, यह अस्तित्व के विविध पहलुओं के बीच अंतर्निहित संबंध की व्याख्या करता है। यह उस एकता का आधार है जो ब्रह्मांड को एक साथ रखती है, ठीक उसी तरह जैसे हमारा संविधान भारतीय गणराज्य के लिए एकता के सूत्र के रूप में कार्य करता है।

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"द्रव्यगुणकर्मसामान्यविशेषसमवायनां पदार्थानाम्।" वैशेषिक सूत्र अर्थात, द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय, यह सूत्र समवाय को वास्तविकता की सात श्रेणियों में से एक के रूप में वर्णित करता है और इसे अस्तित्व के मौलिक सिद्धांत के रूप में स्थापित करता है।

गणतंत्र दिवस समवाय की सामाजिक और राजनीतिक अभिव्यक्ति का प्रतिनिधित्व करता है। संविधान और भारत के नागरिकों के बीच का संबंध एक अविभाज्य संबंध है, जो परस्पर निर्भरता में निहित है। जिस तरह समवाय किसी पदार्थ को उसके गुणों से बांधता है, उसी तरह संविधान अपने नागरिकों की सक्रिय भागीदारी से ही सार्थकता प्राप्त करता है।

जबकि नागरिक संविधान में निहित सिद्धांतों के माध्यम से अपने अधिकार और जिम्मेदारियाँ प्राप्त करते हैं। यह संबंध विविधता में एकता को दर्शाता है, जो भारत की पहचान है। हमारे देश समुदायों की परस्पर निर्भरता के माध्यम से ही पोषित होता है, ठीक उसी तरह जैसे किसी पदार्थ के विभिन्न तत्व उसकी संपूर्णता में योगदान करते हैं।

ऋग्वेद ने हमारे देश की एकता के इस सार को खूबसूरती से व्यक्त किया है:

संगच्छध्वं संवदध्वं

सं वो मनांसि जानताम्

देवा भागं यथा पूर्वे

सञ्जानाना उपासते।।

—ऋग्वेद 10.191.2

अर्थात, “एक साथ चलो, एक साथ बोलो, अपने मन को एक करो।”

यह श्लोक केवल भौतिक एकता के लिए अपील नहीं है, बल्कि विचार और उद्देश्य प्राप्ति के स्तर पर समवाय का आह्वान है, जो विविधता में सामंजस्य का आग्रह करता है।

जबकि समवाय बाहरी कारकों की परस्पर संबद्धता को दर्शाता है, यह स्वयं के भीतर आवश्यक एकता का भी प्रतीक है। हमारे विचार, भावनाएं और कार्य अविभाज्य रूप से जुड़े हुए हैं, और उनके बीच असंगति आंतरिक संघर्ष की ओर ले जाती है।

उदाहरण के लिए, धार्मिक कार्य और कर्म (प्रयास) के बीच अविभाज्य संबंध को लें। भगवद्गीता में कहा गया है कि आपको अपने कर्तव्यों का पालन करने का अधिकार है, लेकिन उसके फलों का नहीं। यहां, श्रीकृष्ण समवाय के व्यावहारिक अनुप्रयोग को दर्शाते हैं: क्रिया (कर्म) और इरादे (धर्म) के बीच का संबंध। ईमानदारी से कार्य करने के लिए, हमें अपने प्रयासों को सकारात्मक और सामाजिक कल्याण के साथ जोड़ना चाहिए, व्यक्तिगत और सामूहिक कल्याण के बीच परस्पर संबंध को मूर्त रूप देना चाहिए।

इसी प्रकार, प्रकृति स्वयं समवाय की अभिव्यक्ति है। उदाहरण के लिए, एक पेड़ मिट्टी, सूरज की रोशनी और पानी के साथ अपने संबंध के कारण मौजूद है। ये तत्व पेड़ के अस्तित्व से अविभाज्य हैं, ठीक वैसे ही जैसे पेड़ ऑक्सीजन, छाया और जीविका प्रदान करके पर्यावरण में योगदान देता है। यह परस्पर निर्भरता हमें पारिस्थितिक सामंजस्य का महत्व सिखाती है। आज हम जिन पर्यावरणीय चुनौतियों का सामना कर रहे हैं, वनों की कटाई से लेकर जलवायु परिवर्तन तक, वे प्रकृति के साथ हमारे अंतर्निहित संबंध को भूलने का परिणाम हैं।

समवाय को अपनाकर हम स्थिरता और पारस्परिकता के सिद्धांतों के साथ स्वयं को फिर से जोड़ सकते हैं। समवाय एक साधक, एक विद्यार्थी की क्षमता और शिक्षक से मिलने वाले मार्गदर्शन के बीच के बंधन के समान है। एक कलाकार के लिए समवाय उसके रंगों और कैनवास पर उभरती कला के साथ उसके विचारों से सम्बंधित है। एक धावक के लिए समवाय उसकी शारीरिक शक्ति, दृढता और धैर्य और ध्यान ही हैं। यह केवल एक दार्शनिक अवधारणा नहीं है; यह जीने का एक तरीका है। 

आज इस प्रौद्योगिकी के युग में, समवाय डिजिटल दुनिया में भी प्रासंगिक है। जहां हर डिवाइस, सर्वर और उपयोगकर्ता स्वाभाविक रूप से जुड़ा हुआ है, वहां इस नेटवर्क की अखंडता इसके घटकों की निर्बाध बातचीत पर निर्भर करती है। इसी तरह, हमारा जीवन रिश्तों, जिम्मेदारियों और साझा अनुभवों का एक नेटवर्क है।

इस प्रकार, हमारे अधिकारों और कर्तव्यों, व्यक्तित्व और समुदाय, परंपरा और प्रगति के बीच अविभाज्य बंधन का प्रतिबिम्ब है समवाय। राष्ट्र की ताकत उसके विविध तत्वों के सामंजस्यपूर्ण परस्पर क्रिया में निहित है, वैशेषिक दर्शन में समवाय के सिद्धांत की तरह। तो आइए, हम अपने जीवन में इस सिद्धांत को अपनाएं - रिश्तों को महत्व दें, अपनी साझा विरासत का सम्मान करें और अधिक से अधिक राष्ट्र निर्माण में योगदान दें। क्योंकि हमारी परस्पर निर्भरता को समझने और अपनाने से, हम स्वतंत्रता और जिम्मेदारी का सही अर्थ खोज पाएंगे।

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लेखिका: डॉ. अनन्या मिश्र, सीनियर मैनेजर– कॉर्पोरेट कम्युनिकेशन्स एवं मीडिया रिलेशन्स, आईआईएम इंदौर

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