होलकर स्टेडियम में दर्शकों की क्षमता से कम सीटें हैं
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खांडेकर ने भले ही पत्र लिखकर अपनी पीड़ा व्यक्त की हो, लेकिन पीड़ा शहर के क्रिकेटप्रेमियों की भी कम नहीं है। 35 लाख की आबादी को दस हजार से भी कम टिकट उपलब्ध कराए गए। एमपीसीए के पदाधिकारी तो बताने तक को तैयार नहीं हैं कि कितने टिकट ऑनलाइन बिके हैं और कितने ऑफलाइन। टिकटों की व्यवस्था कुछ इस प्रकार रहती है कि बड़ी संख्या में पास बंट जाते हैं। फिर क्लब्स से जुड़े पदाधिकारियों और सदस्यों को टिकट जाते हैं। जो बच जाते हैं, वह ऑनलाइन बिकते हैं। इस बार टिकट ऑनलाइन हुए और कुछ ही सेकंड्स में बिक भी गए। अब टिकटों की ब्लैक मार्केटिंग शुरू हो गई है। हजारों में टिकट बिक रहे हैं। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि एक कारोबारी ने तो टिकट की फोटोकॉपी कर बेचना शुरू कर दिया और लाखों रुपये कमा लिए।
बात सीधी और सच्ची है कि होलकर स्टेडियम काफी नहीं है। यह तो महारानी उषाराजे ट्रस्ट क्रिकेट मैदान था, जिसे 2010 में मध्य प्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन ने होलकर स्टेडियम बना दिया। 30,000 दर्शकों की क्षमता है, लेकिन टिकट 10 हजार भी उपलब्ध नहीं होते। जाहिर है कि शहर को बड़ा स्टेडियम चाहिए। इंदौर नगर निगम के कब्जे वाला नेहरू स्टेडियम तो अब क्रिकेट मैचों में इस्तेमाल होता ही नहीं है। 2001 में वहां भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच आखिरी वनडे मैच हुआ था। उसके बाद सारे मैच होलकर स्टेडियम में ही हुए हैं। अब डिमांड बढ़ रही है तो दर्शकों की क्षमता भी बढ़ाए जाने की जरूरत है।
मैच होने पर हर तरफ गाड़ियों की कतारें लग जाती हैं
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होलकर स्टेडियम में कोई मैच होता है तो पूरा शहर स्टैंडस्टिल हो जाता है। शहर के बीचोंबीच में जो है। पार्किंग की व्यवस्था है नहीं, लिहाजा सड़कें बंद करनी पड़ती है। मैच शुरू और खत्म होने पर जो स्थिति बनती है, वह किसी से छिपी नहीं है। शहर के बाहर स्टेडियम बनाने की बातें भी हुई हैं, लेकिन कागजों पर ही आकर बात सिमट गई। एमपीसीए के पदाधिकारी हो या प्रशासनिक अधिकारी, सबको अपनी वाहवाही और पास-टिकट चाहिए, लेकिन इंदौर के क्रिकेटप्रेमियों की चिंता किसी को नहीं है, जिसकी खातिर ही यह स्टेडियम बना है।