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ओंकारेश्वर-महेश्वर से पैदल नर्मदा जल ले जा रहे उज्जैन, कांवड़ यात्रा में दिखे आस्था के नए रंग

Fri, 07 Aug 2026 06:53 PM IST
Abhishek Chendke न्यूज डेस्क, अमर उजाला, इंदौर

सार

 ओंकारेश्वर और महेश्वर से उज्जैन तक निकल रही कांवड़ यात्रा आस्था, भक्ति और समर्पण का अनूठा संगम बन गई है। छोटे बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक हजारों शिवभक्त हर दिन 25 से 30 किलोमीटर पैदल चलकर बाबा महाकाल को नर्मदा जल अर्पित करने पहुंच रहे हैं।
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भोले की वेशभूषा में भक्त - फोटो : amarujala
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विस्तार
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इंदौर की तरफ आने वाली सड़कों पर सावन माह में आस्था के नए रंग बिखरे हैं। आंखों पर महंगे सनग्लासेस, कंधे पर सजी-धजी कांवड़ और बोल बम के जयघोष के साथ उठते कदमों से ओंकारेश्वर से उज्जैन के बीच की दूरी पैदल तय हो रही है। कई भक्त महेश्वर से भी उज्जैन जा रहे हैं।

आस्था की कांवड़ उठाने वालों में 12 से 15 साल के बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग भी हैं। आखिर क्या मिलता है कांवड़ यात्रा से? यह पूछे जाने पर उनका जवाब होता है—बाबा की भक्ति के बाद मन में संतोष रहता है। शरीर में अलग ही ऊर्जा रहती है। हर रोज हजारों कदम पैदल चलने के बावजूद दर्द नहीं ठहरता है।

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अलग-अलग कावड़ के साथ भक्ति का सफर - फोटो : amarujala

बंगाली कांवड़ बनने में किए दस हजार खर्च

कांवड़ यात्रा में शामिल एक युवक की कांवड़ पीतल से बनी थी और काफी सजी-धजी थी। उसने बताया कि वह पांच साल से पैदल कांवड़ यात्रा में शामिल होता है। इस बार बंगाली कांवड़ से यात्रा करने की इच्छा थी। दस हजार का खर्च आया, लेकिन कांवड़ देखकर लोग आते हैं तो खुशी मिलती है। उसकी कांवड़ में फूल, मोरपंख और पीतल की घंटियां बंधी हैं। एक शिवभक्त तो कंधे पर शिव प्रतिमा को लेकर पैदल-पैदल चल रहे हैं।

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बेटा और कांवड़ दोनों एक साथ - फोटो : amarujala

नाबालिग भी उठा रहे कांवड़

कांवड़ यात्रा में नाबालिग भी कांवड़ उठाए चल रहे हैं। वे अपने माता-पिता या अन्य रिश्तेदार के साथ यात्रा में शामिल हैं। इसके अलावा एक पिता अपने कंधे के एक तरफ कांवड़ और एक तरफ बेटे को बैठाकर चलते नजर आए।
 

हर दिन 25 से 30 किमी पैदल यात्रा

कांवड़ के साथ शिवभक्त हर दिन 25 से 30 किलोमीटर पैदल यात्रा कर रहे हैं। हरी-भरी वादियों और पहाड़ों के बीच से पैदल चलते शिवभक्त रात में किसी मंदिर में विश्राम करते हैं। डेढ़ सौ किलोमीटर का सफर चार से पांच दिन में किया जा रहा है।

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