बुधवार सुबह एक बजे के करीब किरत सिंह के फोन की घंटी बजती है दूसरी तरफ से उनका 22 साल का बेटा धर्मेन्द्र रोते हुए कहता है 'पापा हम लोग गए अब हम नहीं मिलने वाले'। यह शब्द सुनते ही किरत सिंह का दिल धक से बैठ जाता है।
मुंबई जा रही कामायनी एक्सप्रेस के जनरल कोच में बैठे धर्मेन्द्र ने ट्रेन के मध्यप्रदेश के हरदा में दुर्घटनाग्रस्त होने के बाद अपने पिता को यह फोन किया था।
किरत सिंह के परिवार के 11 सदस्य ट्रेन दुर्घटना में मारे गए 29 लोगों में शामिल हैं जो कामायनी एक्सप्रेस के बेपटरी होने के कारण हुआ।
इंडियन एक्सप्रेस की खबर के अनुसार अधिकारियों की मानें तो भारी बारिश के कारण रेल ट्रैक के नीचे मिट्टी से बना बेस खिसक गया था जिसके चलते ट्रैक रेल का वजन नहीं झेल पाया। जिस समय यह हादसा हुआ और दोनों ट्रेनों के कुल 18 डिब्बे पटरी से उतरे उस समय इनमें सवार अधिकतर यात्री सोए हुए थे।
अधिकारियों की मानें तो हादसे में घायल होने वाले और मरने वालों का आंकड़ा अभी बढ़ भी सकता है क्योंकि कुछ लोग नहर के तेज बहाव में बह गए। ऐसे में वह लोग हर्दा जिला अस्पताल के बाहर इंतजार कर रहे हैं जहां शवों को पोस्टमार्टम के लिए लाया जा रहा है।
धर्मेन्द्र ने फोन मिलाकर पिता को दी थी जानकारी
वहीं धर्मेन्द्र ने बताया था कि हादसा जनता एक्सप्रेस के भिरंगी को पार करने के कुछ ही मिनट बाद हो गया। धर्मेन्द्र के अनुसार इंजन से अगला डिब्बा पूरी तरह झुक गया था। इससे पहले की हम कुछ समझ पाते डिब्बे की लाइट चली गई और पानी अंदर घुसने लगा।
हर कोई चिल्ला रहा था और जल्द से जल्द बाहर निकलने का प्रयास कर रहा था। हर तरफ घुप्प अंधेरा था और पानी फैला हुआ था। उसने बताया कि उससे अलग परिवार के 13 लोग मध्यप्रदेश के गोटगांव से ट्रेन में शाम सात बजे सवार हुए थे।
जनता एक्सप्रेस श्रीधाम स्टेशन पर दो घंटे देरी से पहुंची थी। परिवार के मुखिया किरत सिंह पूरी तरह गमगीन हालत में हैं। रोते हुए कहते हैं ट्रेन सात बजे स्टेशन से रवाना हुई थी। मैं उनके साथ नहीं जा सका क्योंकि मेरी पत्नी और मेरी मां उनके साथ थीं।
वे शिरडी के लिए जा रहे थे, 14 गए थे लेकिन 3 ही वापस लौटे। रात 1 बजे के करीब धर्मेन्द्र ने मुझे फोन किया था, जिसके बाद उसने आखिरी बार मेरी पत्नी से मेरी बात करवाई। हालांकि कुछ लोग भाग्यशाली भी रहे।
हर तरफ था घुप्प अंधेरा और पानी-पानी
जिनमें से एक हरीलाल, जो जलगांव से कामायनी एक्सप्रेस में सवार हुए थे। बताते हैं कि मैं जनरल डिब्बे में सवार था जबकि मेरी पत्नी दूसरे डिब्बे में थी, उसने मुझे रात का खाना खाने के लिए बुलाया था। इसी बीच ट्रेन दुर्घटनाग्रस्त हुई और मेरा डिब्बा बेपटरी हो गया।
इसके बाद हम सब एक एक कर डिब्बे से बाहर निकले। बाहर का नजारा दंग करने वाला था जहां एक तरफ दूसरी ट्रेन का इंजन दुर्घटनाग्रस्त हुआ पड़ा था तो एक तरफ पानी ही पानी था। घुप अंधेरे में यह सब भयावह था।
हरीलाल बताते हैं कि जहां हादसा हुआ वहां के स्थानीय निवासी सबसे पहले बचाव के लिए पहुंचे। हादसे के दो घंटे बाद पहली सहायता ट्रेन घटनास्थल पर पहुंची। इसके बाद भोपाल और मऊ से राहत टीम वहां पहुंची।
पानी के तेज बहाव से खोखला हो गया था ट्रैक
हादसे के संबंध में मुख्य सचिव एंथनी डी सा ने बताया कि लोगों की मौत पानी में डूबने के कारण हुई। 14 शव एक ही डिब्बे से निकाले गए। इनमें से ज्यादातर की मौत जान बचाने के लिए पानी में छलांग लगाने के कारण हुई जो डूब गए।
सबसे बड़ी दिक्कत ये रही कि दुर्घटनास्थल तक केवल रेल द्वारा ही पहुंचा जा सकता था क्योंकि हर तरफ पानी भरा होने के कारण वहां तक सड़क द्वारा पहुंचना संभव नहीं था।
वहीं राहत अभियान भी उस समय बाधित हुआ जब बुधवार दोपहर एक बार फिर तेज बारिश हो गई। वहीं, मुख्यमंत्री शिवराज चौहान ने घटनास्थल का दौरा कर मरने वालों के परिजनों को दो लाख और घायलों को 50-50 हजार रुपये की मदद करने की घोषणा की है।