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Dhar Bhojshala Controversy: यहां सत्याग्रह हुआ तेज, ASI रिपोर्ट के बाद ये मांग पकड़ रही रफ्तार; सिक्के भी मिले

Tue, 24 Feb 2026 07:10 PM IST
धार ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, धार

सार

धार की भोजशाला में हर मंगलवार आयोजित होने वाले सत्याग्रह के तहत हनुमान चालीसा पाठ और पूजा-अर्चना की गई। एएसआई रिपोर्ट सार्वजनिक होने के बाद आंदोलन से जुड़े लोगों ने भोजशाला को हिंदुओं को सौंपने और मां सरस्वती की पूजा की मांग तेज कर दी है। पढ़ें पूरी खबर
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सर्वें में शामिल तथ्य।
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विस्तार
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केंद्रीय पुरातत्व विभाग के अधीन धार की भोजशाला में सत्याग्रह आयोजित किया गया। भोजशाला की मुक्ति आंदोलन की कड़ी में हर मंगलवार को भोज उत्सव समिति द्वारा सत्याग्रह के माध्यम से पूजा-अर्चना की जाती है। इसके चलते सुबह हनुमान चालीसा का पाठ एवं पूजन किया गया, इसमें बड़ी संख्या में हिंदू समाज के लोग एकत्रित हुए।
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एक दिन पूर्व ही एएसआई की रिपोर्ट सार्वजनिक हुई हैं, जिसके चलते समाज के लोगों में उत्साह नजर आया। भोजशाला को पूरी तरह से हिंदुओं को सौंपने और वहां मां सरस्वती की पूजा की मांग को लेकर चल रहा एक अनिश्चितकालीन आंदोलन है। इस दौरान भोज उत्सव समिति के अध्यक्ष सुरेश जलोदिया, संरक्षक अशोक जैन, महाप्रबंधक हेमंत दौराया, महामंत्री सुमित चौधरी, विश्वास पांडे, मोहन राठौर, निखिल जोशी सहित अन्य पदाधिकारी मौजूद रहे।

जानें क्या बोले गोपाल शर्मा?
अधिवक्ता श्रीश दुबे, भोजशाला मुक्ति यज्ञ संयोजक गोपाल शर्मा ने बताया कि सर्वे रिपोर्ट में यह स्पष्ट हुआ, कि भोजशाला का वास्तविक स्वरूप सरस्वती कंठाभरण का ही है। भोजशाला परिसर की खुदाई में जमीन में बहुमंजिला संरचना होने के पुख्ता प्रमाण सामने आए हैं। दो स्तंभ मिले, जिन पर ॐ सरस्वतयै नम: लिखा है। ऐसे एक दो नहीं अनेकों प्रमाण स्पष्ट हैं। गोपाल शर्मा एएसआई द्वारा किए गए सर्वे के दौरान भी भोजशाला में मौजूद थे, प्रतिदिन सुबह से लेकर शाम तक एएसआई की सर्वे टीम के साथ सभी तथ्यों को देखा था।
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'मंदिरों का ही हिस्सा'
अधिवक्ता दुबे के अनुसार 98 दिन चले सर्वे में एएसआई ने 2189 पेज की सर्वे रिपोर्ट तैयार की थी। सर्वे में पाए गए अनेक प्रमाणों, स्तंभों, स्तंभों की कला और वास्तुकला से स्पष्ट हो चुका है कि ये स्तंभ पहले मंदिर का हिस्सा थे, बाद में इन्हें अतिक्रमण और क्षतिग्रस्त कर मस्जिद के स्तंभ बनाते समय उनका पुन: उपयोग किया गया था। मौजूदा संरचना में चारों दिशाओं में खड़े 106 और अन्य 82, कुल 188 स्तंभ मिले हैं। इनकी वास्तुकला से इस बात की पुष्टि होती हैं, कि ये स्तंभ मूल रूप से मंदिरों का ही हिस्सा थे। उन्हें वर्तमान संरचना के लिए पुनर्उपयोग में लाने को उन पर उकेरी देवताओं और मनुष्यों की आकृतियों को विकृत कर दिया गया। मानव और जानवरों की कई आकृतियां, जिन्हें मस्जिदों में रखने की अनुमति नहीं है, उन्हें छैनी जैसी किसी वस्तु का इस्तेमाल कर बिगाड़ा गया था। वर्तमान में संस्कृत और प्राकृत भाषा में लिखे कई शिलालेख मिले, जो भोजशाला के ऐतिहासिक, साहित्यिक और शैक्षणिक महत्व को स्पष्ट करते हैं।

'ग्रंथों में वर्णन मिला'
संयोजक शर्मा के अनुसार एक ऐसा भी शिलालेख मिला, जिस पर परमार वंश के राजा नरवर्मन का उल्लेख है। नरवर्मन ने 1094-1133 ईस्वी के बीच शासन किया था। परिसर के पश्चिम क्षेत्र में कई स्तंभों पर उकेरे 'कीर्तिमुख, मानव, मगरमच्छ, और मिश्रित चेहरों वाली सजावटी सामग्री विद्यमान है। कीर्तिमुख का सनातन वास्तुकला में में बड़ा ही महत्व है। कीर्तिमुख का वर्णन भगवान शिव से जुड़ा है। स्कंद पुराण, शिव पुराण और पद्मपुराण, वास्तु शिल्प जैसे ग्रंथों में इसका विस्तृत वर्णन मिलता है। दीवारों में खिड़की की फ्रेम पर उकेरी गई देवताओं की छोटी-छोटी आकृतियां मिली हैं, जिनकी स्थिति अभी भी अच्छी और स्पष्ट है।

30 सिक्के भी मिले
अधिवक्तास दुबे के अनुसार 94 ऐसी मूर्तियां मिलीं, जिन पर महीन नक्काशी है। इसके अलावा कई ऐसे आर्टिकल भी मिले, जो भोजशाला के मंदिर होने को प्रमाणित कर रहे हैं। ये कलाकृतियां संगमरमर, नरम पत्थर, बलुआ पत्थर और चूना पत्थर से तैयार की गईं थीं। उकेरी गईं छवियों में भगवान गणेश, ब्रह्मा जी, नृसिंह, भैरव, देवी-देवता, मानव और सनातन में पूज्य जीवों की आकृतियां शामिल थीं। इसके अलावा अन्य जीवों की छवि जैसे शेर, हाथी, घोड़ा, कुत्ता, बंदर, सांप, कछुआ, हंस और पक्षी शामिल हैं। 30 सिक्के भी प्राप्त हुए हैं। ये सिक्के चांदी, तांबा और अन्य धातुओं से निर्मित हैं और परमारकालीन हैं।

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'सनातन आस्था का केंद्र'
गोपाल शर्मा के अनुसार हालांकि, अभी सर्वे अपूर्ण है। क्योंकि अभी बहुत बड़े हिस्से को सर्वे में छोड़ दिया गया है। जहां इससे भी बड़े प्रमाण उपलब्ध हैं। परंतु 2189 पन्नों की यह रिपोर्ट अपने आप में यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है कि उक्त परिसर सनातन आस्था का प्रमुख केंद्र है और सदियों से रहा है। और अब समय है कि हम इस गौरव को पुनः प्राप्त करते हुए, वहां मां वाग्देवी सरस्वती मंदिर का एक अद्भुत, भव्य एवं दिव्य मंदिर पुनः स्थापित करें जो संपूर्ण विश्व राजा भोज के समय की भोजशाला के दर्शन कर सके।

सर्वें में शामिल तथ्य

 

सर्वें में शामिल तथ्य

 

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