शहर के केपी कॉलेज में बीए फाइनल ईयर के 35 से अधिक छात्र विश्वविद्यालय की लापरवाही के चलते परीक्षा देने से वंचित रह गए। शुक्रवार 24 अप्रैल को जब छात्र परीक्षा देने कॉलेज पहुंचे, तब उन्हें पता चला कि इंडियन फॉरेन पॉलिसी सहित अन्य विषयों का पेपर 22 अप्रैल को ही हो चुका है। इस घटना के बाद छात्रों में नाराजगी है और कॉलेज व विश्वविद्यालय प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठने लगे हैं।
जानकारी के अनुसार विश्वविद्यालय के पहले जारी टाइम टेबल में परीक्षा की तारीख 24 अप्रैल निर्धारित थी लेकिन बाद में इसे बदलकर 22 अप्रैल कर दिया गया। इस बदलाव की सूचना अधिकांश छात्रों तक नहीं पहुंच पाई और छात्र फरवरी में मिले पुराने टाइम टेबल के अनुसार ही तैयारी करते रहे और तय तारीख पर परीक्षा देने कॉलेज पहुंच गए। कुछ छात्रों को अपडेटेड टाइम टेबल की जानकारी मिल गई थी, जिसके चलते 22 अप्रैल को 371 विद्यार्थियों ने परीक्षा दी, जबकि कुल 403 छात्र-छात्राएं पंजीकृत थे। करीब 35 छात्र ऐसे रहे, जो जानकारी के अभाव में परीक्षा नहीं दे पाए।
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न मैसेज आया, न कॉलेज ने बताया
भौंरासा की छात्रा पायल कुमावत ने बताया कि मेरे पास जो टाइम टेबल था, उसमें 24 अप्रैल को पेपर था। जब कॉलेज पहुंची तो प्राचार्य ने बताया कि पेपर 22 अप्रैल को हो चुका है। कॉलेज के किसी ग्रुप में कोई सूचना नहीं दी गई। वेबसाइट पर भी 24 अप्रैल की तारीख ही दिख रही थी। छात्र पीयूष बीसे ने कहा कि कॉलेज ने 20 फरवरी को जो टाइम टेबल दिया था, उसी के अनुसार हम तैयारी कर रहे थे। मैं अशोक नगर से पेपर देने आया था लेकिन यहां आकर पता चला कि परीक्षा पहले ही हो चुकी है। आर्थिक स्थिति पहले ही कमजोर है, अब सप्लीमेंट्री परीक्षा के लिए करीब 2600 रुपए खर्च करने पड़ेंगे।
छात्र संगठन ने लगाए लापरवाही के आरोप
एनएसयूआई के पूर्व छात्र नेता ने इस मामले को गंभीर लापरवाही बताते हुए कहा कि आमतौर पर परीक्षाएं आगे बढ़ाई जाती हैं, लेकिन यहां तो तय तारीख से पहले ही पेपर ले लिया गया। यदि टाइम टेबल में बदलाव किया गया था तो इसकी जानकारी समय पर देना जरूरी था। उन्होंने प्रभावित छात्रों के लिए पुन: परीक्षा कराने की मांग की है।
प्राचार्य ने माना छात्रों के साथ हुआ अन्याय
केपी कॉलेज के प्राचार्य सर्वपालसिंह राणा ने स्वीकार किया कि विश्वविद्यालय ने 20 फरवरी को जारी टाइम टेबल में परीक्षा की तारीख 24 अप्रैल दी थी, जिसे बाद में बदलकर 22 अप्रैल कर दिया गया। उन्होंने कहा कि छात्रों को इस बदलाव की जानकारी नहीं मिल पाई, जिससे वे परीक्षा से वंचित रह गए। यह नैसर्गिक न्याय के सिद्धांत के खिलाफ है। हमारे रिकॉर्ड के अनुसार करीब 35 छात्र प्रभावित हुए हैं।
उन्होंने बताया कि इस मामले को विश्वविद्यालय के समक्ष उठाया गया है और प्रयास किया जा रहा है कि प्रभावित छात्रों के लिए पुन: परीक्षा आयोजित हो, ताकि उन्हें सप्लीमेंट्री परीक्षा न देनी पड़े।