बुंदेलखंड में राजस्थान की परंपरा का निर्वहन पिछले 40 साल से हो रहा है। इसका निर्वहन हटा और बटियागढ़ क्षेत्र में रहने वाले भील परिवार करते हैं। यह परंपरा उनके धर्म से जुड़ी है, जिसके अनुसार भूमि स्वामी तब तक फसल का दाना भी नहीं खा सकता है, जब तक वह प्रकृति पूजन, इंद्रदेव और नागबासुकी की पूजा कर उनका अंशभाग उनको अर्पित नहीं कर देते।
बता दें कि यह पूजा या रीति का पालन राजस्थान से 40 साल पहले आकर हटा, बटियागढ़ के जंगलों में बसे आधा दर्जन गांव के भील समाज के लोग करते आ रहे हैं। हटा तहसील अंतर्गत दमोतीपुरा पंचायत के सूरजपुरा, मनकपुरा, कुअरपुरा, बनौली, नेपार, भारतीपुरा, रावतपुरा और सादपुर के जंगल सहित अन्य क्षेत्र में यह भील समाज बसी हुई है। जो स्थानीयता के प्रमाण पत्र सहित मध्यप्रदेश शासन से कृषि भूमि भी ले चुकी है।
दरअसल, खरीफ की फसल में ये लोग सबसे ज्यादा मक्का की फसल बोते हैं। क्योंकि मक्का का सेवन इनके द्वारा साल भर किया जाता है। मक्का की फसल तैयार होकर खाने योग्य होने पर हटा के जंगलों में टोले में बसे 300 से अधिक परिवार सामूहिक रूप से जुड़ते हैं और एक स्थान पर प्रकृति पूजन, इंद्रदेव भाग, नागबासूकी भाग देते हैं। इसके बाद सभी लोग मक्का का सेवन करते हैं।
भील समाज के कुशाल, आशाराम और जीवन भील ने बताया कि यह परंपरा पूर्वजों से बनी हुई है। इस परंपरा के अनुसार, भूमि स्वामी पूजा के पहले अपने खेत या अन्य खेत में उपजी फसल नहीं खा सकता है। वह फसल उपयोग तभी करते हैं जब प्रकृति, इंद्रदेव और नागबासुकी का अंश भाग उनको समर्पित कर देते हैं। हालांकि, मासूम बच्चों और अन्य समाज से आने वाले अतिथियों पर यह प्रतिबंध लागू नहीं होता। यदि पूजा के पहले किसी कारणवश मक्का या अन्य कुछ भी फसल नुकसान वश हाथ में आ गई तो उसका उपयोग नहीं करते, बल्कि मवेशियों को खिला देते हैं।
पूजा में पांच की प्राथमिकता
जंगलों के बीच इन लोगों के द्वारा मूर्ति स्वरूप प्रकृति, इंद्रदेव व नागदेव बासुकी के चबूतरे पर प्रतिमाएं स्थापित की गई हैं। सामूहिक पूजा के दौरान प्रकृति, इंद्रदेव और नागबासुकी को पांच की मात्रा में मक्का अर्पित की जाती है। भील आदिवासियों में मान्यता है कि इस पूजन से उनके यहां भरपूर फसल मिलती है और इंद्रदेव उनकी फसल के अनुरूप खुश होकर वर्षा करते हैं।