बालाजीराव को दिया स्वप्न
लगभग 325 वर्ष पूर्व मराठा दीवान बालाजी राव चांदोरकर जिनका मुख्यालय दमोह था। एक दिन यात्रा करते हुए बांदकपुर आए और वर्तमान इमरती कुंड में स्नान कर पूजन में मग्न थे। कहा जाता है भगवान शिव ने दर्शन दिए और कहा कि वटवृक्ष के पास जहां घोड़ा बंधा हुआ है। उसके नीचे खुदाई करके मुझे भूमि से ऊपर लाने का प्रयास करो।
ध्यान समाप्त होने पर बालाजी राव ने उस स्थल की खुदाई कराई जहां काले भूरे पत्थर का शिवलिंग दृष्टिगत हुआ। कहा जाता है कि 30 फीट तक खुदाई करने पर भी शिवलिंग का अंत नहीं दिखाई दिया। तब खुदाई रोक दी गई। फिर आसपास 12 फीट की नींव देकर मंदिर का निर्माण कराया गया।
गर्भ गृह के सामने है पार्वती मंदिर
भगवान जागेश्वरनाथ का शिवलिंग जमीन की सतह पर है। शिवलिंग को भेंट करते समय बाद दोनों बाजुओं में नहीं समाता। मंदिर का मुख्य द्वार पूर्व की ओर है। पूर्व द्वार से जागेश्वर मंदिर से लगभग 100 फीट की दूरी पर पश्चिम की ओर जगत जननी मां पार्वती की मूर्ति इस अद्भुत ढंग से विराजमान है कि उनकी दृष्टि सीधी आकर भगवान जागेश्वर की मूर्ति पर पड़ती है। इसके बीच में ही विशाल नंदी मठ स्थित है। नंदी ऊंचाई में होने पर भी दोनों के दर्शन स्पष्ट दिखते हैं।
नंदीमठ के पास अमृत कुंड, इमरती बावली है जिसमें ट्रस्ट कमेटी ने सीड़िया लगा दी हैं एवं विद्युत पंप लगाकर ऊपर पानी की व्यवस्था की है। इस बावड़ी में गंगोत्री, जमनोत्री, नर्मदा नदी आदि पवित्र नदियों का जल यात्रीगण छोड़ जाते हैं। यह पवित्र जल ही शिवलिंग पर चढ़ा कर गंगाजली में घर ले जाते हैं। श्रद्धालु गंगाजल के साथ कांवर भी चढ़ाते हैं।
लगते है हल्दी के हांथ
अपनी मनोकामना पूर्ण करने के लिए श्रद्धालु हल्दी के हाथ गर्भगृह के पीछे दीवाल पर लगाते हैं और मनोकामना पूर्ति होने पर पुन: आते हैं। कावरयात्री नर्मदा तट से जल लाकर श्रद्धा पूर्वक भगवान शिव को चढ़ाते हैं।
बने हैं कई मंदिर
मंदिर परिधि में शिव पार्वती मंदिर के अलावा श्री भैरवनाथ मंदिर, राम लक्ष्मण जानकी मंदिर, हनुमान मंदिर, सत्यनारायण मंदिर भी हैं। यहां यज्ञ भी होता है।
जागेश्वर मंदिर की सिद्धि से जुड़ी कुछ घटनाएं
पूर्वज बताते हैं कि महाशिवरात्रि पर सवा लाख का कावरों का जल शिव पार्वती पर अर्पित होने पर दोनों मंदिर के स्वर्ण कलशों पर लगे झंडे आपस में मिल जाते हैं। इसका उल्लेख दमोह गजेटीयर में भी है।
ऐसा भी कहा जाता है कई साल पहले एक बालिका देव पूजन के लिए आई भक्तों की भीड़ में धक्के के कारण फिसल कर पानी में गिर गई और उसकी मौत हो गई। तब श्रद्धालु भक्तों ने महादेव के शिवलिंग के समक्ष उसका शव रखकर उनकी स्तुति की दरवाजे बंद कर दिए।कुछ देर बाद बालिका जीवित हो उठी। इसका विशद वर्णन जागेश्वर रहस्य में उलेखनीय है।
जागेश्वरधाम मंदिर के प्रबंधक पंडित रामकृपाल पाठक ने बताया भगवान जागेश्वरनाथ को तेरहवें ज्योतिर्लिंग के रूप में पूजा जाता है। चारों धाम की यात्रा करने के बाद श्रद्धालु जागेश्वरधाम आते हैं तब उन्हें यात्रा का पूरा फल मिलता है। महाशिवरात्रि को लाखों श्रद्धालु भगवान को जल अर्पित करने पहुंचते हैं। एक लाख कांवर भगवान को चढ़ने के बाद शिव मंदिर और पार्वती मंदिर के झंडे आपस में मिल जाते हैं।