पांढुर्णा का विश्व प्रसिद्ध गोटमार मेला शुक्रवार को आयोजित किया जाएगा, जिसको लेकर प्रशासन के द्वारा धारा 144 लगा दी गई हैं। एक दिन पहले इस मेले के आयोजन को लेकर नगर पालिका परिषद पांढुर्णा के सभाकक्ष में कलेक्टर मनोज पुष्प, पुलिस अधीक्षक विनायक वर्मा, पांढुर्णा विधायक निलेश उईके, एसडीएम पांढुर्णा आर आर पाण्डे ने सभी प्रशासनिक अधिकारियों की बैठक लेकर प्रशासन को मुस्तैद रहने के निर्देश दिए गए। कलेक्टर एसपी ने मेला स्थल का जायजा भी लिया। गोटमार मेले में पूर्ण सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए चिकित्सा व्यवस्था के अंतर्गत दोनों पक्षों में गोटमार खिलाड़ियों के प्राथमिक उपचार के लिए चिकित्सा कैंप लगाए जाएंगे।
धारा 144 रहेगी प्रभावी
कलेक्टर मनोज पुष्प ने बैठक में लोगों को बताया कि गोटमार मेला पांढुर्णा का पारंपरिक मेला है। प्रशासन ने घायल लोगों के उपचार के लिए एंबुलेंस और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र जैसी तमाम व्यवस्था की हैं, गोफन को प्रतिबंधित किया गया है, धारा 144 प्रभावी रहेगी, किसी भी तरह की घटना ना घटे इसके लिए विशेष निगरानी ड्रोन और सीसीटीवी कैमरे से की जाएगी।
जानिए आस्था और परंपरा की दिलचस्प कहानी
मध्य प्रदेश के पांढुर्णा में हर साल गोटमार मेले का आयोजन किया जाता है, जिसमें दो गांवों के लोग एक-दूसरे पर जमकर पथराव करते हैं। किवदंती है कि सालों पहले पांढुर्णा का लड़का साबर गांव की लड़की को प्रेम प्रसंग के चलते भगा कर ले गया था, दोनों जैसे ही जाम नदी में पहुंचे तो लड़की और लड़के के परिवार वालों ने उन पर पत्थरों से हमला कर दिया था, जिससे दोनों की बीच नदी में मौत हो गई थी। इस घटना के बाद से लोग प्रायश्चित स्वरूप एक दूसरे को पत्थर मारकर गोटमार मेला मनाते हैं। सालों पुरानी इस परंपरा में अब तक 14 से ज्यादा लोगों ने अपनी जान गंवा चुके हैं। फिर भी ये गोटमार पांढुर्णा में जारी है।
पलाश के पेड़ को लड़की मानते हैं सावरगांव के ग्रामीण
सावरगांव के बुजुर्ग तुकाराम मेले को लेकर बताते हैं कि मेला कब से शुरू हुआ किसी को इस विषय में कुछ जानकारी नहीं है। पिछले कई सालों से मेले का आयोजन हो रहा है। जाम नदी में चंडी माता की पूजा के बाद सावरगांव पक्ष के लोग जाम नदी में पलाश के पेड़ को लगाकर उसमें भगवा झंडी बांधते हैं। यहां ये जानना खास होगा कि जिस पलाश के पेड़ को नदी में लगाया जाता है उसे सावरगांव पक्ष के लोग अपनी लड़की मानते हैं क्योंकि लड़की भी साबर गांव से थी, फिर गोटमार मेला शुरू होता है, तो पांढुर्णा पक्ष के लोगों इस पलाश के पेड़ को छीनने के लिए सावरगांव के लोगों पर पत्थरबाजी करते हैं। आखिर में जब ये पेड़ तोड़ लिया जाता है तो दोनों पक्ष मिलकर चंडी मां की पूजा अर्चना कर इस गोटमार को खत्म करते हैं।
भाद्र पक्ष की अमावस्या की तिथि पर आयोजित होता है मेला
कलेक्टर मनोज पुष्प का कहना है गोटमार मेला छिंदवाड़ा का पारंपरिक मेला है। प्रशासन ने घायल लोगों के उपचार के लिए एम्बुलेंस और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र जैसी तमाम व्यवस्था कर रखी हैं, वहीं पुलिस टीम भी मौजूद रहेगी। पांढुर्णा में 300 से अधिक सालों से पोला के दूसरे दिन अमावस्या की तिथि में ये मेला आयोजित होता है। ग्रामीण लोगों ने अभी तक इस मेले के स्वरूप से कोई छेड़छाड़ नहीं की है। मेला पुरातन काल से ऐसा ही आयोजित हो रहा है।
दोनों गांव के लोग होते हैं घायल, लेकिन नहीं होता मनमुटाव
हर साल आयोजित होने वाले गोटमार मेले में सैकड़ों लोग घायल होते हैं, लेकिन खेल खत्म होने के बाद दोनों ही गांव के लोग एक दूसरे से गले मिलते हैं। पांढुर्णा में चंडी माता मंदिर में पूजा अर्चना कर आशीर्वाद लेते हैं, साल भर दोनों गांव के लोगों के बीच भाईचारा बना रहता है। बता दें कि सावरगांव और पांढुर्णा के लोग गोटमार मेले में एक दूसरे पर जमकर पत्थरबाजी करते हैं, बहुत सारे लोग तो हर साल गोट मार खेलने आते हैं, जिले के बाहर के लोग भी मान्यता को लेकर गोटमार खेलने आते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि कम से कम पांच पत्थर फेंकने का रिवाज है।