अगर बेटियां ठान लें, तो समाज की पुरानी सोच भी बदल सकती है। ऐसा ही एक उदाहरण बुरहानपुर की इंदिरा कॉलोनी में देखने को मिला। यहां रिटायर्ड शिक्षक राकेश श्रीवास्तव के निधन पर उनकी बेटियों ने बेटे की जिम्मेदारी निभाकर समाज को नई दिशा दी।
अगर बेटियां ठान लें तो समाज की पुरानी सोच भी बदल जाती है। ऐसा ही एक उदाहरण बुरहानपुर की इंदिरा कॉलोनी में देखा गया, जहां रिटायर्ड शिक्षक राकेश श्रीवास्तव के निधन पर उनकी बेटियों ने बेटे जैसा फर्ज निभाकर सबको नई सोच दिखाई। शासकीय सुभाष हायर सेकंडरी स्कूल से सेवानिवृत्त शिक्षक श्रीवास्तव का निधन हो गया। चूंकि उनके कोई बेटे नहीं थे, इसलिए उनकी अंतिम यात्रा में कंधा देने और मुखाग्नि देने का काम उनकी बेटियों ने किया।
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इंजीनियर दीपाली श्रीवास्तव ने चिता को मुखाग्नि दी, जबकि उनकी छोटी बेटी इंजीनियर वर्षा श्रीवास्तव ने पिता की अर्थी को कंधा दिया। शवयात्रा सिंधीवस्ती श्मशान घाट तक गई, जहाँ समाज के लोग, शुभचिंतक और कर्मचारी महासंघ के प्रदेश अध्यक्ष ठाकुर संतोष सिंह दीक्षित समेत कई गणमान्य व्यक्ति मौजूद थे।
कायस्थ समाज के जिला सचिव आर.पी. श्रीवास्तव ने बताया कि मंझली बेटी प्रियंका श्रीवास्तव अमेरिका में होने की वजह से अंतिम संस्कार में नहीं आ सकीं। इसके बावजूद, दो बेटियों ने अपने पिता को विदा देकर यह दिखा दिया कि अब बेटियां भी हर जिम्मेदारी निभा सकती हैं।