गोकुल चंद्रमाजी मंदिर होली उत्सव
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फागुन की बयार, रंगों की फुहार और राधा-कृष्ण की भक्ति बुरहानपुर का गोकुल चंद्रमाजी मंदिर बुधवार को सचमुच ब्रजधाम जैसा प्रतीत हुआ। मंदिर परिसर में फाग खेलन बरसाने आए हैं…, खेलन दे मोहे होरी रे रसिया… और मेरी चुनर में लग गयो दाग… जैसे पारंपरिक फाग गीतों की गूंज से वातावरण भक्तिरस में डूब गया।
फागुन उत्सव के अंतर्गत आयोजित छैल-छबीली होली में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी। कार्यक्रम की शुरुआत फूलों की होली से हुई। पुष्प वर्षा होते ही पूरा परिसर रंग-बिरंगे फूलों की खुशबू से महक उठा और श्रद्धालु भक्ति में सराबोर हो गए। इसके बाद हास्य रस से भरपूर छैल-छबीला मंचन हुआ, जिसमें गोपियों और ग्वाल-बाल की मनमोहक झांकियों ने सभी का मन मोह लिया।
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उत्सव का सबसे आकर्षक क्षण तब आया, जब गोपियों ने रंग बरसाना शुरू किया और साथ ही लड्डुओं की बौछार की गई। भक्तों ने अनोखे अंदाज में एक-दूसरे पर लड्डू बरसाकर होली का आनंद लिया। गुलाल से सराबोर मंदिर परिसर में हर चेहरा उल्लास और आस्था से दमकता नजर आया।
मंदिर में बसंत पंचमी से लेकर होलिका दहन तक लगातार 40 दिनों तक फाग उत्सव मनाने की परंपरा है, जो लगभग 500 वर्ष पुरानी मानी जाती है। यह परंपरा आज भी पूरे श्रद्धाभाव और उत्साह के साथ निभाई जा रही है।
कार्यक्रम के अंत में होली के प्रतीक स्वरूप राल अर्पित कर विधिवत होलिका दहन किया गया। इसके बाद पूरा परिसर भक्ति, उल्लास और रंगों के उत्सव में डूब गया।
मंदिर प्रमुख हरिकृष्ण मुखियाजी ने बताया कि प्रत्येक वर्ष फागुन माह में ब्रज परंपरा के अनुसार छैल-छबीली होली का आयोजन किया जाता है, ताकि भक्तों को वृंदावन की अनुभूति हो और वे राधा-कृष्ण की भक्ति में लीन हो सकें। इस मौके पर अपार संख्या में उपस्थित वैष्णवजन और श्रद्धालुओं ने आयोजन को भव्य बना दिया। फाग का जादू ऐसा छाया कि हर कोई नाचता-गाता और रंगों में सराबोर नजर आया।