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Burhanpur: ढोल-नगाड़ों के साथ गांव-गांव फगुआ मांगने निकलती हैं टोलियां, पांच दिन बाद होता है सामूहिक भोज

Sat, 07 Mar 2026 10:35 AM IST
बुरहानपुर ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बुरहानपुर

सार

बुरहानपुर के ग्रामीण क्षेत्रों में होली के बाद आदिवासी समाज की अनूठी परंपरा निभाई जाती है। लोग पांच दिन तक गांव-गांव फगुआ मांगकर अनाज जुटाते हैं। बाद में अनाज बेचकर अंतिम दिन बकरे की बलि के साथ सामूहिक भोज आयोजित किया जाता है।

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बुरहानपुर की अनोखी परंपरा - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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मध्यप्रदेश की संस्कृति और परंपराओं की अपनी अलग पहचान है। इसी कड़ी में बुरहानपुर जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में होली के बाद आदिवासी समाज की एक अनूठी और रोचक परंपरा देखने को मिलती है। होली के दूसरे दिन से आदिवासी समाज के लोग आकर्षक वेशभूषा, रंग-बिरंगे रूप और पारंपरिक नृत्य के साथ गांव-गांव फगुआ मांगने निकलते हैं। ढोल-नगाड़ों की थाप और पारंपरिक गीतों के साथ यह टोली घर-घर पहुंचती है, जिसे देखने के लिए ग्रामीणों की भीड़ उमड़ पड़ती है।

यह परंपरा करीब पांच दिनों तक चलती है। इस दौरान आदिवासी समाज के युवक, बुजुर्ग और कई स्थानों पर महिलाएं भी पारंपरिक पोशाक पहनकर अलग-अलग गांवों में पहुंचते हैं। वे नृत्य-गान करते हुए ग्रामीणों के घरों तक जाते हैं और फगुआ के रूप में अनाज व अन्य सामग्री मांगते हैं। ग्रामीण भी इस परंपरा का सम्मान करते हुए स्वेच्छा से गेहूं, चावल, मक्का सहित अन्य अनाज और सामग्री प्रदान करते हैं।

समाज के लोग इन सभी अनाज और वस्तुओं को सामूहिक रूप से एकत्रित करते हैं। पांच दिनों तक जुटाए गए इस अनाज को बाद में बाजार में बेच दिया जाता है। इससे प्राप्त राशि से अंतिम दिन पूरे समाज द्वारा सामूहिक भोज का आयोजन किया जाता है।

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परंपरा के अनुसार इस अवसर पर ‘गुट’ यानी बकरे की बलि भी दी जाती है, जिसके बाद सामूहिक भोज आयोजित होता है। इस भोज में समाज के सभी लोग एक साथ बैठकर भोजन करते हैं, जिससे आपसी एकता और भाईचारे की भावना और मजबूत होती है।

आदिवासी समाज की यह परंपरा केवल उत्सव या मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक एकता, सहयोग और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक भी मानी जाती है। वर्षों से चली आ रही यह परंपरा आज भी बुरहानपुर और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ निभाई जा रही है।

होली के रंगों के बाद जब आदिवासी समाज की टोलियां नृत्य और गीतों के साथ गांव-गांव फगुआ मांगने निकलती हैं, तो यह दृश्य सचमुच “अजब एमपी, गजब होली” की झलक पेश करता है और प्रदेश की समृद्ध लोकसंस्कृति को जीवंत बना देता है। 

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