मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा की फायर ब्रांड नेत्री उमा भारती इन दिनों अपने नशाबंदी आंदोलन के चलते चर्चा में हैं। भाजपा से ज्यादा कांग्रेस के लोग उन्हें चर्चा में रखे हुए हैं। उमा अपने ट्वीट से भी अक्सर सुर्खियों में रहती हैं। आज उन्होंने कुछ ऐसे ही ट्वीट किए।
उमा भारती ने एक के बाद एक करीब नौ ट्वीट किए। जिसमें उन्होंने अपनी संन्यासी जीवन की शुरुआत और अयोध्या से जुड़ी बातें साझा की हैं। हालांकि उन्होंने अयोध्या कांड के बाद जेल जाने और उसके बाद के संघर्ष पर विस्तार से बात करने का भी कहा है।
उमा भारती ने आज किए ट्वीट में लिखा कि मुझे आज अमरकंटक पहुंचना था अपरिहार्य कारणों से अभी भोपाल में हूं। पूर्णिमा के चंद्र ग्रहण (8 दिसंबर) के बाद अमरकंटक पहुंच जाऊंगी। 17 नवंबर 1992 को अमरकंटक में ही मैंने संन्यास दीक्षा ली थी। मेरे गुरु कर्नाटक के कृष्ण भक्ति संप्रदाय के उड़पी कृष्ण मठ के पेजावर मठ के मठाधीश थे। मेरे गुरु श्री विश्वेश्वर तीर्थ महाराज देश के सभी राजनीतिक दलों के नेताओं, सभी धर्म गुरुओं के आदर एवं श्रद्धा के केंद्र रहे। 96 वर्ष की आयु में उन्होंने 2 वर्ष पूर्व देह त्याग कर कृष्ण लोक गमन किया।
उमा ने कहा कि राजमाता विजयराजे सिंधिया जी के अनुरोध पर तब अविभाजित मध्यप्रदेश के अमरकंटक आकर उन्होंने मुझे संन्यास की दीक्षा प्रदान की। मेरा संन्यासी दीक्षा समारोह तीन दिन चला उसमें राजमाता जी, उस समय के मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री पटवा जी, मुरली मनोहर जोशी जी, भाजपा की मध्य प्रदेश की लगभग पूरी सरकार, भाजपा के देश एवं प्रदेश के सभी वरिष्ठ नेता एवं संघ के सभी वरिष्ठ स्वयं सेवक दीक्षा संस्कार में उपस्थित रहे। जब भंडारा हुआ तो हजारों संत नर्मदा जी के किनारों के जंगलों से निकलकर आए एवं भोजन ग्रहण कर मुझे आशीर्वाद दिया।
पूर्व केंद्रीय मंत्री ने कहा कि इस साल की मार्गशीर्ष माह की अष्टमी को जो कि फिर से 17 नवंबर को पड़ रही है, मेरे संन्यास दीक्षा के 30 वर्ष हो जाएंगे। उस समय मेरे शरीर की आयु से 32वां वर्ष लगा हुआ था। अमरकंटक में संस्कार दीक्षा के तुरंत बाद मुझे अयोध्या में भीड़ जुटाने की जिम्मेदारी दी गई। फिर 6 दिसंबर की घटना हुई। अमरकंटक से अयोध्या, अयोध्या में बाबरी ढांचा गिरा, वहीं से मुझे आडवाणी जी के साथ जेल भेज दिया। जेल से बाहर निकले तो दुनिया बदल चुकी थी, हमारी सरकारें गिर चुकी थीं, फिर तो 1992 से 2019 तक कड़ी मेहनत एवं संघर्ष के दिन थे। मैं कभी इन बातों पर विस्तार से लिखूंगी।