मध्यप्रदेश में नर्सिंग कॉलेजों की मान्यता और परीक्षा व्यवस्था को लेकर उठते रहे सवालों के बीच अब नर्सिंग रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया भी घेरे में आ गई है। एनएसयूआई प्रदेश उपाध्यक्ष रवि परमार ने दावा किया है कि मध्यप्रदेश नर्सेस रजिस्ट्रेशन काउंसिल की ऑनलाइन व्यवस्था में गधे की फोटो और ऐसे दस्तावेज अपलोड करने के बाद भी रजिस्ट्रेशन प्रमाणपत्र जारी हो गया, जिनसे वास्तविक नर्सिंग योग्यता साबित नहीं होती। रवि परमार के मुताबिक, ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन व्यवस्था की जांच के लिए उन्होंने इसका परीक्षण किया। आवेदन में आवेदक की फोटो के स्थान पर गधे की फोटो लगाई गई। इसके साथ ही आवश्यक दस्तावेजों की जगह कथित तौर पर ऐसे दस्तावेज अपलोड किए गए, जिनसे शैक्षणिक योग्यता प्रमाणित नहीं होती थी। निर्धारित शुल्क का भुगतान करने के बाद रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया पूरी हुई।
बाद गधे के नाम से नर्सिंग रजिस्ट्रेशन
परमार का दावा है कि इसके बाद गधे के नाम से नर्सिंग रजिस्ट्रेशन प्रमाणपत्र जारी हो गया। उनका कहना है कि यदि पोर्टल पर यह प्रक्रिया वास्तव में इसी तरह पूरी हुई है तो यह केवल तकनीकी खामी नहीं, बल्कि आवेदक की पहचान और शैक्षणिक दस्तावेजों के सत्यापन की व्यवस्था पर गंभीर सवाल है।
सवाल- असली दस्तावेजों का सत्यापन कैसे हो रहा?
परमार ने कहा कि जब गलत फोटो और कथित अप्रमाणित दस्तावेजों के आधार पर रजिस्ट्रेशन प्रमाणपत्र जारी हो सकता है तो यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि परिषद आवेदकों की पहचान, शैक्षणिक योग्यता, अंकसूची और अन्य दस्तावेजों का सत्यापन किस स्तर पर करती है। एनएसयूआई जिला अध्यक्ष अक्षय तोमर ने कहा कि नर्सिंग रजिस्ट्रेशन सामान्य ऑनलाइन प्रमाणपत्र नहीं है। इसके आधार पर नर्सिंगकर्मी अस्पतालों और स्वास्थ्य संस्थानों में मरीजों की देखभाल से जुड़ी जिम्मेदारी निभाते हैं। ऐसे में रजिस्ट्रेशन जारी करने से पहले योग्यता और दस्तावेजों का वास्तविक सत्यापन जरूरी है।
यह भी पढें-
एमपी में मौसम ने बदली चाल: 4 दिन बारिश पर ब्रेक, कई शहरों में तेज धूप, कई जिलों से विदाई के संकेत
फर्जी रजिस्ट्रेशन से मरीजों की सुरक्षा का सवाल
एनएसयूआई ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति बिना वास्तविक नर्सिंग योग्यता के रजिस्ट्रेशन हासिल कर लेता है और बाद में इसके आधार पर अस्पताल या नर्सिंग होम में नौकरी करता है तो इसका असर मरीजों की सुरक्षा पर पड़ सकता है। संगठन ने इसे सिर्फ पोर्टल की तकनीकी समस्या मानने के बजाय स्वास्थ्य व्यवस्था से जुड़ा गंभीर विषय बताया। अक्षय तोमर ने कहा कि जांच में यह स्पष्ट होना चाहिए कि संबंधित प्रमाणपत्र वास्तव में जारी हुआ है या ऑनलाइन व्यवस्था की किसी तकनीकी अथवा सत्यापन संबंधी खामी के कारण यह स्थिति बनी। साथ ही जिम्मेदारी भी तय की जानी चाहिए।