'हम भारत के लोग, भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व-संपन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा इसके समस्त नागरिकों कोः सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त कराने के लिए उन सब में व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता तथा अखंडता सुनिश्चित करने वाली
इस दिन को बीते आज 75 साल हो गए हैं, जब भारतीय जनमानस ने भारत के संविधान को न सिर्फ अंगीकृत, अधिनियमित किया था। बल्कि आत्मार्पित भी किया था...आत्मार्पित इस शब्द के गहन और गूढ़ मायने हैं। हमारा संविधान सिर्फ अधिकार और कर्तव्य की सूची ही नहीं, बल्कि मूल्यों की थाती भी है। इसलिए इसे अंगीकृत और अधिनियमित के साथ-साथ आत्मार्पित अर्थात स्वयं को अर्पित किया गया है। आजादी के इतने साल बीतने के बाद यह जरूरी है कि हम सभी पीछे मुड़कर देखें और अपनी-अपनी समझ को विस्तार दें। संविधान के मूल्यों को समझें और उन्हें अपने व्यवहार में अपनाएं। यह समझें ही नहीं वरन दायित्व उठाएं संविधान की रक्षा की, क्योंकि यही संविधान हम भारत के नागरिकों के लिए सबसे बड़ा सुरक्षा कवच है। हमें एक रखता है। एक समान जीवन जीने का अधिकार देता है।
बंधुता बढ़ाने के लिए दृढ़ संकल्पित होकर अपनी इस संविधान सभा में आज दिनांक 26 नवंबर, 1949 ई. को एतद् द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।'
यूं पीछे मुड़कर देखें तो भारत में संविधान सभा की मांग सर्वप्रथम पूर्ण स्वाराज्य का नारा बुंलद करने वाले बाल गंगाधर तिलक ने 1895 में उठाई थी। इसके बाद से इस मांग ने जोर पकड़ा। इसके बाद नौ दिसंबर 1946 को संविधान सभा की पहली बैठक नौ दिसंबर 1946 को कंस्टिट्यूशन हॉल में हुई। यह सिर्फ एक बैठक नहीं गुलामी से आजाद भारत की ओर बढ़ने की मजबूत यात्रा की शुरुआत थी। दो सदी से गुलाम रहे हमारे देश में पौ फटने से पहले फैलने वाला हल्का उजियारा था। गहन रात्रि खत्म होने को थी और 14 अगस्त 1947 की रात 11 बजे जब संविधान सभा की बैठक हुई तो इतिहास नई करवट लेने को आतुर था।
स्वतंत्रता की भोर होने को थी, लेकिन यह स्वतंत्रता हमेशा अक्षुण्ण रहे इसके लिए एक विस्तृत नियामिका की आवश्यक्ता थी। इसलिए जब दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की नींव रखी जा रही थी, ठीक उसी समय मजबूत नींव तैयार हो रही थी। विश्व के सबसे बड़े लिखित संविधान की। वह संविधान जो भारत के प्रत्येक नागरिक को समानता-स्वंतत्रता के साथ जीवन यापन करने देने का सबसे मजबूत आधार है। इस आधार को मजबूत बनाने वाली सभा में 299 सदस्य थे। सभा की अध्यक्षता डॉ. राजेंद्र प्रसाद और प्रारूप समिति की अध्यक्षता डॉ. बाबा साहब भीमराव अंबेडकर कर रहे थे। संविधान को पूर्ण रूप से तैयार होने में 2 वर्ष 11 माह 18 दिन का समय लगा था। अथक मेहनत के बाद दिन आया था, 26 नवंबर 1949 का जब भारतीय संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित किया गया था।
अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करने का अर्थ सिर्फ यह नहीं कि संविधान ने हमें भारतीय नागरिक के तौर पर सिर्फ अधिकार दिए हैं। बल्कि हमें कर्तव्यों की सीमा रेखा में बांधा भी है। यह स्पष्ट किया है कि अपने अधिकारों का उपयोग करते हुए हमें दूसरों के अधिकारों का भी पूर्ण सम्मान करना ही होगा। जब हम संविधान की बात करते हैं तो हमें उसमें निहित मूल्यों पर भी गंभीरता से चिंतन करना होगा। देखना होगा कि हमारे आस-पास हर जगह मानवीय गरिमा, समाजिक न्याय, समता, स्वतंत्रता जैसे संवैधानिक मूल्यों का पूरा ध्यान रखा जा रहा है या नहीं। कहीं कोई ऐसा कृत्य तो नहीं हो रहा जो मानवीय गरिमा, समाजिक न्याय, समता, स्वतंत्रता के खिलाफ हो। यहां हमें सिर्फ पड़ोसी के व्यवहार का आंकलन नहीं करना बल्कि जरूरी है कि हम सभी स्वआंकलन करें कि हमारे आचार-व्यवहार में कोई कमी तो नहीं क्योंकि सुधार की गुंजाइश हर जगह होती है।
हमारा संविधान सिर्फ लिखित पुस्तिका नहीं बल्कि यह नागरिक संहिता है, जो हमें जीवन जीने की राह दिखाती है। जिस पर चलकर हम अपने राष्ट्र को पहले से अधिक मजबूत औऱ भारतीय नागरिकों को पहले से अधिक खुशहाल बना सकते हैं। आज जब संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित किए 75 साल पूर्ण होने जा रहे हैं तो हम भारत के लोग...अपने आप से एक वादा तो कर ही सकते हैं कि वे अपने रोजमर्रा के जीवन में अपने स्वयं के व्यवहार का आंकलन करेंगे। जानेंगे-समझेंगे कि हम अपने व्यवहार में संवैधानिक मूल्यों के प्रति कितने सजग हैं।