राम मंदिर मामले का फैसला सुनाने वाले इलाहबाद हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त जस्टिस सुधीर अग्रवाल ने सरकारी शिक्षा व्यवस्था, स्वास्थ्य सुविधाएं, कानून और न्यायिक व्यवस्था में असमानता पर गंभीर सवाल उठाए हैं। रविवार को भोपाल में प्रेस क्लब के एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ और सबका साथ-सबका विकास' जैसे नारे तब तक सफल नहीं हो सकते, जब तक देश के हर बच्चे को समान और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नहीं मिले। उन्होंने कहा कि जब तक बहुसंख्यक जनता के बच्चों को वही शिक्षा उपलब्ध नहीं कराई जाएगी, जैसी हम अपने बच्चों को देते हैं। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि सरकारी स्कूलों का स्तर ऐसा होना चाहिए कि कलेक्टर और चपरासी का बच्चा एक ही स्कूल में, एक जैसी इज्जत और समान अवसर के साथ पढ़ सके। सरकारी स्कूल में पढ़ना गर्व की बात होनी चाहिए। लेकिन सचाई यह है कि शिक्षक ही अपने बच्चे को सरकारी स्कूल में नहीं पढ़ाना चाहते।
जस्टिस अग्रवाल ने अपने छात्र जीवन को याद करते हुए कहा कि वे उत्तर प्रदेश से हैं और पहले सरकारी स्कूलों में दाखिला मिलना बड़ी उपलब्धि माना जाता था। आज स्थिति उलट हो गई है। उन्होंने कहा कि सरकारी स्कूलों में वेतन और संसाधनों की कोई कमी नहीं है, लेकिन सबसे दुखद बात यह है कि सरकारी स्कूलों में पढ़ाने वाले शिक्षक भी अपने बच्चों को वहां पढ़ाना नहीं चाहते। उन्होंने व्यवस्था सुधारने का एकमात्र प्रभावी उपाय बताते हुए कहा कि नेताओं, जजों और सरकारी अधिकारियों के बच्चों को अनिवार्य रूप से सरकारी स्कूलों में पढ़ाया जाए। जब डीएम का बच्चा सरकारी स्कूल जाएगा और शाम को बताएगा कि शौचालय गंदा है या शिक्षक समय पर नहीं आते, उनको पढ़ाते ही नहीं आता तो व्यवस्था अपने आप सुधरने लगेगी।
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सरकारी अस्पताल में इलाज तो ही मिले पुनर्भुगतान
उन्होंने स्वास्थ्य व्यवस्था पर बात करते हुए कहा कि यदि लोग स्वस्थ नहीं रहेंगे तो शिक्षा भी नहीं ले पाएंगे। उन्होंने कहा कि सरकार बहुत सी स्वास्थ्य योजनाएं चला रही है, लेकिन जरूरत पड़ने पर हम सभी निजी अस्पतालों की ओर भागते हैं। सरकारी अधिकारी तक इलाज के लिए सरकारी अस्पताल नहीं जाते, जबकि उन्हें इलाज का रिइम्बर्समेंट 'पुनर्भुगतान मिलता है। यदि सरकारी अस्पतालों में ही इलाज कराया जाए, तो अस्पतालों की स्थिति भी सुधरेगी। उन्होंने यूपी के कौशांबी जिले का उदाहरण देते हुए बताया कि एक फैसले के बाद वहां के जिला कलेक्टर ने अपनी पत्नी की डिलीवरी सरकारी अस्पताल में कराने का निर्णय लिया। शुरुआत में लोगों ने उनको मना किया, लेकिन उन्होंने सरकारी अस्पताल ही जाने का निर्णय लिया, फिर वहां के चीफ मेडिकल सुप्रीटेंडेंट ने पता लगाया कि अस्पताल में क्या क्या सुविधाएं हैं। मशीनें खरीदी गईं और अस्पताल की सुविधाएं बढ़ीं। उन्होंने सुझाव दिया कि सरकारी सुविधाओं का लाभ लेने वालों के लिए सरकारी अस्पतालों में इलाज अनिवार्य किया जाए, अन्यथा रिइम्बर्समेंट न मिले।
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